श्रीकृष्णचरितसुधा महाकाव्य अंतर्गत प्रबोधपर्व (श्रीमद्भगवद्गीता) की समीक्षा
समीक्षक- प्रो. वीरेन्द्र सिंह यादव
प्रोफेसर-हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषा विभाग
डॉ. शकुन्तला मिश्रा राष्ट्रीय पुनर्वास विश्वविद्यालय, लखनऊ-226017, उत्तर प्रदेश (भारत)
मोबाइल: 9415924888
महाकाव्य श्रीकृष्णचरितसुधा के रचनाकार: श्री राजेन्द्र प्रसाद ‘निसेष’
समकालीन हिन्दी साहित्य में श्री राजेन्द्र प्रसाद ‘निसेष’ जी उन रचनाकारों में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं, जिन्होंने सीमित संसाधनों और व्यस्त शैक्षणिक जीवन के बावजूद साहित्य-साधना को निरन्तर जीवित रखा है। उनका जन्म 12 जुलाई सन् 1969 को उत्तर प्रदेश के जनपद लखनऊ के अमौसी-सरोजनीनगर क्षेत्र के गिन्दनखेड़ा ग्राम में एक सामान्य कृषक परिवार में हुआा ग्रामीण जीवन के संस्कार, श्रमशील परिवेश और जीवन-संघर्ष का अनुभव उनके लेखन में स्वाभाविक रूप से झलकता है।
श्री निसेष जी ने हिन्दी साहित्य का अध्ययन औपचारिक शिक्षा के माध्यम से नहीं, बल्कि गहन स्वाध्याय द्वारा किया है। गोस्वामी तुलसीदास की काव्य-परम्परा से उनका विशेष लगाव रहा है। इसी कारण उनकी भाषा सरल, प्रवाहयुक्त और लोकबोध से सम्पन्न है। वे परम्परा को जड़ रूप में नहीं, बल्कि जीवन से जुड़ी चेतना के रूप में स्वीकार करते हैं।
उनकी प्रमुख कृति महाकाव्य श्रीकृष्णचरितसुधा है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण के जीवन-चरित्र को दोहा-चौपाई शैली में आठ अध्यायों में प्रस्तुत किया गया है। यह कृति केवल पौराणिक आख्यान नहीं, बल्कि जीवन, कर्म, कर्त्तव्य, नीति और मानवीय मूल्यों की सहज व्याख्या भी है। विशेषरूप से इसका प्रबोधपर्व, जिसमें श्रीमद्भगवद्गीता के अठारह अध्यायों का काव्यात्मक निरूपण है, लेखक की वैचारिक स्पष्टता और दार्शनिक समझ को रेखांकित करता है।
इसके अतिरिक्त उनका ग़ज़ल-संग्रह ‘बिखरी यादें’ (उपनाम-अख़्तर) भी प्रकाशित हो चुका है, जिसमें संवेदना, स्मृति और सामाजिक यथार्थ का संतुलित संयोजन दिखाई देता है। उनकी ग़ज़लों में अनावश्यक अलंकरण नहीं, बल्कि अनुभवजन्य सच्चाई प्रमुख है।
वर्तमान में श्री निसेष लाला रामस्वरूप शिक्षा संस्थान इण्टर कॉलेज, बंथरा, लखनऊ में अंग्रेजी अध्यापक के रूप में कार्यरत हैं। शिक्षण और साहित्य- दोनों क्षेत्रों में उनकी सक्रियता यह प्रमाणित करती है कि वे साहित्य को केवल लेखन तक सीमित नहीं रखते, बल्कि उसे जीवन मूल्यों से जोड़ते हैं।
कुल मिलाकर, श्री राजेन्द्र प्रसाद ‘निसेष’ जी का लेखन लोकधर्मी, मूल्यपरक और समसामयिक चेतना से सम्पन्न है। श्रीकृष्णचरितसुधा के माध्यम से उन्होंने परम्परागत काव्यरूप को आधुनिक संदर्भों से जोड़ते हुए हिन्दी साहित्य को एक महत्वपूर्ण कृति प्रदान की है।
श्रीकृष्णचरितसुधा : प्रबोधपर्व (श्रीमद्भगवद्गीता)-
एक समकालीन, वैज्ञानिक-तार्किक एवं कालजयी कृति की समीक्षा
भारतीय मनीषा की परम्परा में श्रीमद्भगवद्गीता केवल एक धार्मिक ग्रन्थ नहीं, अपितु मानव-जीवन का सर्वांगीण दर्शन है। वह दर्शन जो युद्धभूमि में जन्म लेकर भी शान्ति, विवेक, कर्म, ज्ञान, भक्ति और आत्मानुशासन की बात करता है। इसी कालजयी ग्रन्थ को केन्द्र में रखकर रचा गया श्रीकृष्णचरितसुधा का प्रबोधपर्व अपने आप में एक विशिष्ट साहित्यिक एवं वैचारिक उपक्रम है। यह कृति न केवल गीता का काव्यात्मक पुनर्पाठ है, बल्कि उसे समसामयिक जीवन-स्थितियों, वैज्ञानिक सोच और व्यावहारिक यथार्थ से जोड़ने का भी सफल प्रयास करती है।
1. पृथक प्रकाशन की औचित्यपूर्ण अवधारणा- प्रबोधपर्व के पृथक प्रकाशन का निर्णय स्वयं में एक सांस्कृतिक-लोकतांत्रिक दृष्टि का परिचायक है। आज के समय में जब ज्ञान का बाजारीकरण हो चुका है और महाकाव्यात्मक ग्रन्थ सामान्य पाठक की पहुँच से दूर होते जा रहे हैं, वहाँ इस अध्याय का अलग से प्रकाशन एक लोक-हितकारी साहित्यिक हस्तक्षेप है। यह निर्णय इस तथ्य को रेखांकित करता है कि लेखक का लक्ष्य केवल काव्य-प्रतिभा का प्रदर्शन नहीं, बल्कि ज्ञान का प्रसार है। यह दृष्टिकोण आधुनिक शिक्षा-दर्शन से भी मेल खाता है, जहाँ accessibility of knowledge को सर्वोपरि माना जाता है। प्रबोधपर्व का पृथक प्रकाशन उसी वैज्ञानिक सोच का विस्तार है।
2. काव्य-रूप एवं शिल्प : परम्परा और आधुनिकता का संतुलन- श्रीकृष्णचरितसुधा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह तुलसीदासीय परम्परा की दोहा-चौपाई शैली में रचित होते हुए भी आधुनिक पाठक को बोझिल नहीं लगती। प्रबोधपर्व में गीता जैसे दार्शनिक ग्रंथ को इस छन्दात्मक संरचना में बाँधना अत्यन्त चुनौतीपूर्ण कार्य है, जिसे रचनाकार ने उल्लेखनीय सफलता के साथ सम्पन्न किया है। यहाँ शिल्प केवल सौन्दर्य का साधन नहीं, बल्कि संज्ञानात्मक सरलता (cognitive simplicity) का माध्यम बनता है। मनोविज्ञान कहता है कि छन्दबद्ध रचना स्मृति और आत्मसात्करण में सहायक होती है—इस दृष्टि से यह कृति वैज्ञानिक रूप से भी सार्थक ठहरती है।
3. गीता का वैज्ञानिक-तार्किक पुनर्पाठ- प्रबोधपर्व की केन्द्रीय उपलब्धि यह है कि वह गीता को चमत्कार-प्रधान ग्रंथ के रूप में नहीं, बल्कि तर्कसम्मत जीवन-दर्शन के रूप में प्रस्तुत करता है। यहाँ श्रीकृष्ण (ईश्वर) सर्वशक्तिमान अवश्य हैं, किन्तु वे मनुष्य को कर्म से पलायन की शिक्षा नहीं देते। गीता का कर्मयोग आधुनिक मनोविज्ञान के action-oriented therapy से साम्य रखता है, जहाँ अवसादग्रस्त व्यक्ति को सक्रियतायुक्त कर्म के माध्यम से मानसिक संतुलन की ओर ले जाया जाता है। अर्जुन का विषाद आज के मनुष्य का existential crisis है—कर्त्तव्य, करुणा, हिंसा, उत्तरदायित्व और आत्म-संघर्ष के बीच फँसा हुआ आधुनिक मानव! श्रीकृष्ण का उपदेश उस संकट का समाधान है।
4. समसामयिक-जीवन में प्रबोधपर्व की प्रासंगिकता- आज का समाज तनाव, अवसाद, नैतिक-भ्रम और उपभोक्तावाद से ग्रस्त है। ऐसे समय में प्रबोधपर्व का अनासक्त-कर्मयोग अत्यंत प्रासंगिक सिद्ध होता है। यह न तो पलायन सिखाता है, न ही अन्धभक्ति; बल्कि कर्त्तव्य-बोध के साथ विवेक का आग्रह करता है। कारपोरेट जीवन, प्रशासन, शिक्षा, राजनीति और पारिवारिक सम्बन्ध—हर क्षेत्र में गीता के सिद्धान्त व्यावहारिक रूप से लागू होते हैं। प्रबोधपर्व इन्हें काव्यात्मक रूप में प्रस्तुत कर जीवन-प्रबंधन ग्रंथ (life management text) का स्वरूप ग्रहण कर लेता है।
5. धार्मिकता के साथ मानवतावादी दृष्टि- इस कृति की विशेषता यह भी है कि यह गीता को केवल हिन्दू धार्मिक ग्रन्थ के रूप में सीमित नहीं करती। यहाँ श्रीकृष्ण सम्प्रदाय-विशेष के देवता नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता के मार्गदर्शक के रूप में उपस्थित हैं। यह दृष्टि आधुनिक secular humanism के निकट पहुँचती है, जहाँ मूल्य, करुणा और विवेक को प्राथमिकता दी जाती है।
6. कालजयी कृति के रूप में मूल्यांकन- कालजयी वही रचना होती है, जो अपने समय से आगे जाकर भी अर्थवान बनी रहे। प्रबोधपर्व इस कसौटी पर खरा उतरता है। इसकी भाषा प्रवाहपूर्ण है, विचार सनातन हैं और दृष्टि आधुनिक। यह कृति भविष्य में भी उतनी ही सार्थक होगी, जितनी आज है।
आलोचनात्मक निष्कर्ष
यदि प्रबोधपर्व को समकालीन पौराणिक-धार्मिक साहित्य की धारा में रखा जाए, तो यह स्पष्टत: पुनर्व्याख्या को आगे बढ़ाने वाली कृति है। यह न तो अंध-परम्परा का पोषण करती है और न ही आस्था का खण्डन—बल्कि दोनों के बीच वैचारिक सेतु का निर्माण करती है। श्री राजेन्द्र प्रसाद ‘निसेष’ जी के महाकाव्य श्रीकृष्णचरितसुधा का षष्ठम अध्याय प्रबोधपर्व एक ऐसी साहित्यिक उपलब्धि है, जो भक्ति, ज्ञान, कर्म और विज्ञान—चारों का संतुलित समन्वय प्रस्तुत करती है। इस दृष्टि से यह ग्रंथ केवल पठनीय बल्कि अनुभवनीय है। समग्रत: श्रीकृष्णचरितसुधा का प्रबोधपर्व केवल श्रीमद्भगवद्गीता का काव्यात्मक पुनर्प्रस्तुतीकरण नहीं है, बल्कि वह गीता को आधुनिक, बौद्धिक अनुशासन, वैज्ञानिक दृष्टि और समकालीन जीवन के संदर्भों से जोड़ने वाला एक सार्थक साहित्यिक उपक्रम है। यह कृति इस तथ्य को स्पष्ट करती है कि गीता का दर्शन किसी विशेष काल, युद्ध या धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं, बल्कि वह मनुष्य के सार्वकालिक मानसिक, नैतिक और अस्तित्वगत प्रश्नों का समाधान प्रस्तुत करता है।
वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो प्रबोधपर्व का कर्मयोग, मानसिक संतुलन, अनासक्ति और आत्मानुशासन—आधुनिक मनोविज्ञान, व्यवहार-विज्ञान और जीवन-प्रबंधन के सिद्धान्तों से गहरे स्तर पर साम्य रखता है। यह कृति यह सिद्ध करने में सफल होती है कि भारतीय दार्शनिक परम्परा केवल आस्था आधारित नहीं, बल्कि अनुभव, तर्क और व्यावहारिक विवेक पर आधारित रही है। इसी कारण यह ग्रन्थ शोधार्थियों के लिए तुलनात्मक अध्ययन, अंतर्विषयी (interdisciplinary) शोध और भारतीय ज्ञान परम्परा के आधुनिक पुनर्मूल्यांकन हेतु पर्याप्त सामग्री उपलब्ध कराता है।
पाठक की दृष्टि से प्रबोधपर्व का महत्व इस बात में निहित है कि यह गूढ़ दार्शनिक विषयों को सरल, प्रवाहपूर्ण और काव्यात्मक भाषा में प्रस्तुत करता है। इससे सामान्य पाठक बिना बौद्धिक बोझ के गीता के मूल तत्त्वों को आत्मसात कर सकता है, वहीं गंभीर पाठक और विद्वान इसमें निहित वैचारिक संरचना और दार्शनिक संकेतों का गहन विश्लेषण कर सकते हैं।
इस प्रकार प्रबोधपर्व न तो केवल भक्ति-काव्य है, न मात्र दार्शनिक ग्रन्थ और न ही केवल साहित्यिक प्रयोग—यह इन तीनों का संतुलित समन्वय है। समकालीन हिन्दी साहित्य में इसे एक ऐसी कृति के रूप में देखा जाना चाहिए, जो परम्परा और आधुनिकता, आस्था और तर्क, काव्य और विज्ञान के बीच सार्थक संवाद स्थापित करती है।
निस्संदेह, यह ग्रन्थ शोधार्थियों, अध्येताओं, शिक्षकों और जागरुक पाठकों—सभी के लिए न केवल पठनीय, बल्कि विचारोत्तेजक और दिशा-सूचक सिद्ध होगा तथा दीर्घकाल तक साहित्यिक और बौद्धिक विमर्श का विषय बना रहेगा। कुल मिलाकर श्री राजेन्द्र प्रसाद ‘निसेष’ जी की यह कृति आज के पाठक को केवल अतीत की कथा नहीं सुनाती, बल्कि वर्तमान में जीने की कला सिखाती है।
