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श्रीकृष्णचरितसुधा के कथानक व काव्य-सौन्दर्य की कुछ झलकियां 

    श्रीकृष्णचरितसुधा

    व्रजपर्व
      (प्रथमांजलि)
 


        मङ्गलाचरण
गणाधिपं     मंगलदं     नमामि
                                      लोकानि सर्वाणि यस्यात्मरूपं । 
खण्डानुखण्डेषु हि दृश्यमानः

                                                          यो दृश्यते ज्ञानिनाखण्डरूपे।।१।।  (पृष्ठ ०१)

भावार्थ- समस्त लोक जिसका आत्मस्वरुप हैं, उस सर्वदा कल्याणकारी गणाधिपति परमात्मा को नमन करता हूँ- जो निश्चय ही खण्डों-अनुखण्डों में विभक्त दिखाई देता है, किन्तु ज्ञानी द्वारा वह अपने अखण्ड स्वरूप में देखा जाता है। 


  श्री राधे कृष्ण वन्दना 
     देवानां अधुना नमामि विनतो श्री वासुदेवं विभुं । 
धर्मधारमनादिमन्तरहितं तत्वादभिन्नो हि  यः।

दातारं कृपया सुबोधसुखदं भूभारहारं हरिम।
                           हन्तारं च द्विषामरिन्दममहं राधांवितं माधवं ।।०६।।  (पृष्ठ ०२)

भावार्थ- अब मैं महानतम देवों  में उन श्री वासुदेव कृष्ण को- जो नित्य, धर्म के आधार, अनादि, अंतरहित और निश्चय ही आत्मतत्व से अभिन्न हैं, अपनी कृपा से सुन्दर सुखदायक आत्मबोध प्रदान करने वाले, पृथ्वी के भार का हरण करने वाले तथा दुष्टों  का वध करने वाले शत्रुजित  माधव को श्री राधा सहित नमन करता हूँ। 


    श्रीकृष्णचरितसुधा  का उद्देश्य व् माहात्म्य 
सब बिधि   सुमंगल   मानि   यह  मंजुल  कथा  ब्रजराज  की । 
 बरनइ   निसेष   कलेस   हरनि   बिमोह   सिंधु   जहाज  सी ।।

जे चढ़हिं भ्रम निधि तरहिं  कनहरि करि कृपानिधि स्याम को ।
           पावहिं   जथारथ   बोध   महि   आनंद   नित   परिनाम   सो ।।०८।।
(पृष्ठ ०२)

भावार्थ- इसमें सब प्रकार से कल्याण है- ऐसा मानकर "निसेष" मोहरूपी समुद्र के जलयान सदृश व्रजराज श्रीकृष्ण की क्लेश हरने वाली इस सुंदर कथा का वर्णन कर रहा है। जो कृपासागर श्रीकृष्ण को ही कर्णधार बनाकर इस पर चढ़ते हैं, उन्हें यथार्थ-बोध की भूमि प्राप्त होती है।