भगवान श्रीकृष्ण का श्रीमद्भगवद्गीता में संदेश- प्रबोधपर्व के महत्वपूर्ण अंश
छंन्द- 28ख-
तनु धरउँ मैं मंगल जगत निज बोध कछु अघटित नहीं।
बस प्रकृति करि निर्लेप गुन पर हरउँ जन संकट महीं।।
थापउँ सुधर्म सुमन सुबारि उखारि खल खर जहँ उगे।
भारत सुजन कल्यान कारन संभवामि जुगे जुुुुगे।।
दोहा- 28ख-
जहँ जग मंगल निरत कोउ लखेउ स्वबस पर काम।
जानेउ ताहि सरूप मम अज अनंत सुखधाम।।
चौपाई-
यह रहस्य जिय जानइँ संता।
जन्म दिब्य मम रूप अनंता।।
धरहिं प्रगट बरु अनित सरीरा।
रहि नित मुकुत हरहिं जग पीरा।।
जिन्ह कर राग रोषु भय बीता।
संबल एक मोहिं मन प्रीता।।
अस बहु ग्यानि भए बपु मोरे।
सेइ जगतप्रभु बंधन छोरे।।
भावार्थ-
मैं संसार के कल्याण के लिए शरीर धारण करता हूँ- आत्मबोध होने से मेरे लिए कुछ भी अघटित नहीं हैा मैं प्रकृृृति को वश में करके तथा इसके गुणों से निर्लिप्त रहते हुए भूमि पर लोगों के संकट हरता हूँ। इस प्रकार मैं पृृृृृृृथ्वीरूपी सुन्दर बाड़ी से दुष्टजनरूपी खरपतवार को उखाड़कर इसमें उत्तम धर्म के पुष्प-पादपों को स्थापित करता हूँ। हे भरतवंशी अर्जुन, सज्जनों के कल्याण के लिए मैं युगों-युगों में उत्पन्न होता रहता हूँ।।28क।।
अर्थात् हे अर्जुन, जहॉं किसी को निष्काम भाव से आत्मवश निरंतर संसार के कल्याण में लगा हुआ देखो, उसे मुझ अजन्मा व अनंत सुखधाम श्रीकृष्ण का ही स्वरूप समझो।
सज्जन पुरुष इस रहस्य को हृदय से जानते हैं कि मेरे दिव्य-जन्म और रूप अनन्त हैं। भले ही वे मेरे स्वरूप साधुपुरुष प्रकटत: अनित्य या नश्वर शरीर धारण करते है, किन्तु वे नित्य-मुक्त रहकर संसार की पीड़ा को हरते रहते हैं।
जिनका राग, क्रोध और भय समाप्त हो गया है और मैं ही एकमात्र जिनका आश्रय हूँ, मुझ में ही जिनके मन की प्रीति है- ऐसे बहुत से मेरे स्वरूप वाले ज्ञानी हुए हैं, जो जगतस्वरूप परमात्मा की सेवा करके सांसारिक बंधनों से मुक्त हुए हैं।
श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार अत्यधिक विषयासक्ति के दुष्परिणाम
श्रीकृष्णचरितसुधा (अध्याय 6) प्रबोधपर्व
दोहा-17
स्वबस धनन्जय जासु तन सोई थिर मति ग्यानि।
सुनहु नास किमि लहहिं नर बिषय निरति परि पानि।।
चौपाई-
निरत बिषय मन उपजइ संगा। अति प्रसंग धर काम उछंगा।।
भंग काम जिय उपजइ क्रोधा। क्रोध मोह मति नासइ बोधा।।
मोह जात नर समृति बिनासा। तासु नास हर बुद्धि प्रकासा।।
बुद्धिहीन नर मिटइ समूला। बिषयासक्ति तात दुख तूला।।
भावार्थ-
हे धनन्जय, जिसका शरीर या इंद्रियॉं वश में हों, वही स्थिरबुद्धि ज्ञानी होता हैा अब वह सुनो कि निरंतर विषयासक्ति के हाथों पड़कर मनुष्य किस प्रकार विनाश को प्राप्त हो जाते हैं-
निरंतर विषयों में पड़े रहने से उनके प्रति मनुष्य के मन में आसक्ति उत्पन्न होती है और अत्यंत (निरंतर) आसक्ति उसे कामनाओं की गोद में डाल देती है। कामनाओं के भंग होने अर्थात् पूर्ण न होने पर क्रोध उत्पन्न होता है और क्रोध बुद्धि को मोहित करता है और समझ को नष्ट कर देता है, फलस्वरूप मनुष्य मूढ़़ता को प्राप्त हो जाता है।
