मंगल करनि अमंगल हरनी। कथा पुनीत ब्यास मुनि बरनी।।
ग्यान गेह गुन गन बिस्तारिनि। मन मल हरनि धरम धुर धारिनि।।
राजेन्द्र प्रसाद 'निसेष' कृत महाकाव्य श्रीकृष्णचरितसुधा का संक्षिप्त-परिचय
सचर अचर जड़ चेतन प्रानी।
बंदउँ कृष्न तत्व मय जानी।।
*’श्रीकृष्णचरितसुधा’* भगवान श्री कृष्ण के जीवन इतिहास पर आधारित हिंदी (अवधी बोली) में लिखा गया एक महाकाव्य है। इसकी रचना गोस्वामी तुलसीदास जी के रामचरितमानस की शैली में *दोहा-चौपाई छंद* में की गई है। इस काव्यात्मक ग्रंथ में कवि ने श्रीमद्भागवत, हरिवंश पुराण, विष्णुपुराण और महाभारत सहित कई पवित्र सनातन ग्रंथों के आधार पर भगवान के संपूर्ण जीवन का वर्णन किया है; साथ ही, अपनी मूल विचारधारा को बनाए रखते हुए आधुनिक भारत के वर्तमान युग की परंपराओं और व्यावहारिकताओं का भी ध्यान रखा है। इस महाकाव्य में भगवान कृष्ण से जुड़ी लोककथाओं और सूरदास एवं अन्य संतों-ऋषियों के विचारों को भी यथोचित स्थान दिया गया है।
इस ग्रंथ को कुल *आठ अध्यायों (पर्वों)* में व्यवस्थित किया गया है, जो इस प्रकार हैं:
*1. व्रज पर्व (Vraj Parva)*
यह इस महाकाव्य का प्रारंभिक अध्याय है। इसमें मंगलाचरण के बाद वंदना प्रकरण आता है। इसके पश्चात सूत उग्रश्रवा और ऋषि शौनक के संवाद; श्री शुकदेव जी और राजा परीक्षित के संवाद; श्री व्यास, वैशम्पायन और राजा जनमेजय के संवाद का वर्णन है। साथ ही, यदुवंश का संक्षिप्त परिचय, राजा कंस के अत्याचार, भगवान कृष्ण के जन्म की कथा, उनकी बाल-लीलाएं, पूतना, तृणावर्त, प्रलंब, धेनुक, केशी जैसे दुष्ट राक्षसों का वध, गोवर्धन धारण, वेणुगीत, महाराज के रहस्य, श्री राधिका जी की लीलाएं, कंस वध, सांदीपनि आश्रम में श्री कृष्ण और बलराम की शिक्षा-दीक्षा एवं दीक्षा, तथा उद्धव-गोपी संवाद आदि का विस्तृत वर्णन है।
*2. प्रयाणक पर्व (Prayanak Parva)*
इस दूसरे अध्याय में मगध नरेश जरासंध और राजा कालयवन को पराजित करने के बाद, श्री कृष्ण और बलराम के मथुरा के वासियों के साथ द्वारका प्रस्थान करने की घटनाओं का वर्णन है।
*3. द्वारिका पर्व (Dwarika Parva)*
तीसरे अध्याय में श्री कृष्ण और बलराम के विवाह, स्यमंतक मणि की कथा, देवर्षि नारद का द्वारका आगमन और श्री कृष्ण की दिनचर्या का अवलोकन, मुरासुर और नरकासुर का वध, पारिजात वृक्ष का हरण, द्रौपदी का स्वयंवर, खांडव दाह, और सुभद्रा हरण जैसी कथाओं का वर्णन किया गया है।
*4. सभा पर्व (Sabha Parva)*
इस अध्याय की शुरुआत कुरुक्षेत्र में वसुदेव जी द्वारा किए गए यज्ञ से होती है। इसमें कुरुक्षेत्र में व्रजवासियों, भारतवंशियों (पांडवों/कौरवों) और द्वारका के यदुवंशियों के मिलन की घटनाएं शामिल हैं। इसके साथ ही वहां उपस्थित राजाओं और ऋषियों की बैठक, ऋषियों और भगवान कृष्ण के उपदेश, राजा जरासंध का वध, युधिष्ठिर का राजसूय यज्ञ, द्रौपदी का चीरहरण, पांडवों का वनवास, शाल्व का वध, बाणासुर की पराजय और काम्यक वन में पांडवों से श्री कृष्ण की भेंट का वर्णन है।
*5. उद्योग पर्व (Udyog Parva)*
पांचवें अध्याय में पांडवों के अज्ञातवास की समाप्ति, राजकुमार अभिमन्यु के विवाह में पांडवों के मित्र-राजाओं के एकत्र होने जैसी कथाएं शामिल हैं। पांडवों का राज्य वापस पाने के लिए वहां उपस्थित राजाओं के साथ भगवान कृष्ण का परामर्श, पांडवों का संधि प्रस्ताव, सहायता मांगने के लिए अर्जुन और दुर्योधन का द्वारका जाना, और युद्ध के लिए दोनों पक्षों द्वारा अपनी-अपनी सेनाएं एकत्र करना। शांति वार्ता विफल होने पर भगवान कृष्ण का शांतिदूत के रूप में हस्तिनापुर जाना और कौरवों व पांडवों की सेनाओं का कुरुक्षेत्र की ओर प्रस्थान आदि का वर्णन है।
*6. प्रबोध पर्व (Prabodh Parva)*
छठे अध्याय में विषादग्रस्त अर्जुन को भगवान श्री कृष्ण द्वारा श्रीमद्भागवत गीता का मुक्तिदायी उपदेश देने की कथा का वर्णन है। इसमें श्री गीता के संपूर्ण 18 अध्यायों का समावेश है।
*7. जय पर्व (Jay Parva)*
यह सातवां अध्याय महाभारत युद्ध की पूरी कहानी से संबंधित है, जिसमें भीष्म, द्रोण, कर्ण का युद्ध और वध; चक्रव्यूह में अभिमन्यु का वध; जयद्रथ का वध; भीम द्वारा दुशासन सहित धृतराष्ट्र के पुत्रों का वध; अश्वत्थामा द्वारा रात में पांचालों और द्रौपदी के पुत्रों का वध; दुर्योधन और भीम के बीच गदा-युद्ध और कुरुक्षेत्र में दुर्योधन का पतन; तथा युद्धक्षेत्र को देखकर वहां महिलाओं के विलाप आदि का मार्मिक वर्णन है।
*8. शांति पर्व (Shanti Parva)*
आठवें अध्याय में युधिष्ठिर का राज्याभिषेक, पितामह भीष्म के उपदेश और उनका देहावसान; भगवान द्वारा मृत बालक परीक्षित को पुनर्जीवित करने की कथा; युधिष्ठिर का अश्वमेध यज्ञ; अनिरुद्ध का विवाह; सुदामा चरित और भगवान कृष्ण द्वारा उद्धव जी को भागवत धर्म का उपदेश (उद्धव गीता) देने की कथाएं वर्णित हैं।
*प्रकाशन एवं संपर्क सूत्र*
यह संपूर्ण महाकाव्य हिंदी व्याख्या (टीका) के साथ उपलब्ध है। इसका प्रकाशन स्वयं लेखक *राजेंद्र प्रसाद ‘निसेष’* द्वारा किया गया है, जो कर्मयोगी साहित्यलाय, 48-गिंदन खेड़ा, अमौसी, लखनऊ-226008 में रहते हैं। उनसे निम्नलिखित माध्यमों से संपर्क किया जा सकता है:
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