Message of Lord

भगवान श्रीकृष्ण का श्रीमद्भगवद्गीता में संदेश- प्रबोधपर्व के महत्वपूर्ण अंश

श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार अत्यधिक विषयासक्ति के दुष्परिणाम

श्रीकृष्णचरितसुधा (अध्याय 6) प्रबोधपर्व


दोहा-17
स्वबस   धनन्जय   जासु   तन   सोई  थिर  मति  ग्यानि।
सुनहु नास  किमि  लहहिं नर  बिषय  निरति  परि पानि।।

चौपाई-
निरत बिषय मन  उपजइ संगा। अति प्रसंग  धर  काम  उछंगा।।

भंग काम जिय  उपजइ क्रोधा। क्रोध मोह  मति  नासइ  बोधा।।

मोह जात नर  समृति बिनासा। तासु  नास  हर  बुद्धि  प्रकासा।।

बुद्धिहीन  नर   मिटइ   समूला। बिषयासक्ति  तात  दुख  तूला।।

भावार्थ-
हे धनन्जय, जिसका शरीर या इंद्रियॉं वश में हों, वही स्थिरबुद्धि ज्ञानी होता हैा अब वह सुनो कि निरंतर विषयासक्ति के हाथों पड़कर मनुष्य किस प्रकार विनाश को प्राप्त हो जाते हैं-
निरंतर विषयों में पड़े रहने से उनके प्रति मनुष्य के मन में आसक्ति उत्पन्न होती है और अत्यंत (निरंतर) आसक्ति उसे कामनाओं की गोद में डाल देती है। कामनाओं के भंग होने अर्थात् पूर्ण न होने पर क्रोध उत्पन्न होता है और क्रोध बुद्धि को मोहित करता है और समझ को नष्ट कर देता है, फलस्वरूप मनुष्य मूढ़़ता को प्राप्त हो जाता है।  मनुष्य की समझ नष्ट होने पर उसकी स्मृति नष्ट हो जाती है। स्मृति का नाश बुध्दि के प्रकाश काे हर लेता है और बुध्दि से रहित हुआ मनुष्य जड़ से नष्ट हो जाता है। इसलिए हे तात, विषयासक्ति दु:ख के समतुल्य है अर्थात् आसक्ति ही दु:ख है।

Author: Rajendra Nisesh

Author of the Book 'Shrikrishnacharitsudha

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