श्रीकृष्णचरितसुधा की भूमिका

श्रीकृष्णचरितसुधा की रचना के सम्बन्ध में रचनाकार का निवेदन

                                ओ३म्               
                            श्रीपरमात्मने नमः
दत्ता कराम्भोजयो ते मयाऽज,   
वल्गा चरन्तीद्रियघोटकानाम्।
सम्भूय हे सारथे सारथिर्मे,
रथिनं नयेरात्मानं विमुक्तिम्।।
   
      (हे अजन्मा श्रीकृष्ण! मैंने आपके कर-कमलों में अपने चलायमान (मन इत्यादि0) इन्द्रियरूपी अश्वों की वल्गाएँ दे दीं। हे (पार्थ) सारथि! आप मेरे सारथी बनकर आत्मारूपी रथी को परम-कल्याण (मुक्ति) में ले चलें।)

विद्वान पाठकगण,
      भगवान श्रीकृष्ण शताब्दियों से भारतीय जनमानस के केन्द्रीय विचार-बिन्दु रहे हैं। हमारा अधिकांश  धार्मिक दर्शन  उनके उदात्त चरित्र व उनकी समन्वयवादी विचारधारा से ओत-प्रोत है। ईश्वरत्व उनके जीवन में सर्वत्र समाविष्ट है। वे योगेश्वर भी हैं और प्रेम-पथ के प्रशस्तिकर्ता भी। उनकी जीवनयात्रा, जो उन्हें सामान्य गोपालक से एक युगपुरुष तक और आगे एक आत्मदर्शी पूर्णपुरुष के पड़ाव तक ले जाती है, अनेक अर्थों में सारगर्भित व अनुशीलन के योग्य है। उनका बहुआयामी जीवन पग-पग पर सामान्यजन की सरल व सहज चर्या से लेकर जटिल राजनैतिक व क्रांतिक परिस्थितियों में मानवमात्र का समुचित मार्गदर्शन करने में आज भी सक्षम है। अतः सहृदय विद्वानों का यह कथन अतिशयोक्ति नहीं है कि यदि भारतीय सांस्कृतिक इतिहास से श्रीकृष्ण को अलग कर दिया जाए तो वह निस्सार व प्राणहीन हो जाएगा।
      बीजरूप वेदों से प्रारम्भ होने वाली भारतीय मनीषा की आध्यात्मिक यात्रा श्रीकृष्ण तक पहुँचते-पहुँचते उपनिषद रूपी छतनार वृक्षों का उपवन बनकर अपने सौरभ से सम्पूर्ण भारतवर्ष को सुवासित करने लगी थी। गीता की समन्वयकारी विचारधाराएँ इन्हीं छायादार वृक्षों की शाखाओं पर लगे फल हैं, जिन्हें श्रीकृष्ण जैसे शाश्वतात्मा वनमाली ने मानवमात्र के रसास्वादन तथा कल्याण हेतु एकत्र किया है; किन्तु गीता मात्र उपनिषदीय विचार समन्वय नहीं है, वरन् यह भगवान श्रीकृष्ण के जीवन व दर्शन का सार है। उनके प्रेरणाप्रद जीवन की प्रत्येक घटना गीता को प्रमाणित करती है। उनका जीवन ही उनका दर्शन है।
      श्रीकृष्ण जीवन के समर्थक हैं, वे इसीलिए प्रवृत्ति व निवृत्ति दोनों मार्गों का समानरूप से पोषण करते हैं, किन्तु उनकी प्रवृत्ति निवृत्तिमय है और निवृत्ति प्रवृत्तिमय; या ऐसा कहा जाए कि वे तुला-दंड के दोनों छोरों को स्पर्श करते हुए भी जीवन-तुला के मध्य में स्थित हैं। वेे जीवन को उसके समस्त इष्टों व अनिष्टों के साथ सहज ही अपना लेते हैं। आनन्द उनके जीवन का मूल है। निंदा, भय, प्रसन्नता, संयोग, वियोग, विप्लव, शान्ति, मैत्री, वैमनस्य आदि समस्त सम अथवा विषम परिस्थितियों के समक्ष वे केवल आनन्दमय ही दिखाई देते हैं। युद्ध जैसी विषमतर परिस्थिति में भी वे परम स्थिर और शान्त-चित्त रहते हैं। गीता इसका साक्षात् प्रमाण है। गोकुल व वृन्दावन का सरल ग्राम्य-जीवन अथवा मथुरा, द्वारिका और इन्द्रप्रस्थ के प्रासादों का राजसी परिवेशश उनके लिए केवल जीवन-यात्रा के कुछ पड़ाव मात्र हैं। वे निश्चय ही इसलिए अलौकिक हैं कि वे आद्यान्त हर्ष और विषाद के द्वन्द्व के पार दिखते हैं। उनकी यह जटिल सरलता अद्भुत है। वे संसार को अपनाकर अनासक्त हैं। जो जिस भाव से उन्हें याद करता है, वे उसे उसी भाव से मिलते हैं। यही ईश्वरीय भाव है, जो उनका परमात्म-तत्व से एकात्म दर्शाता है-
 ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।                       -गीता-4/11
      इसलिए वे मित्रभाव रखने वाले सुदामा के लिए परम मित्र और शत्रुता का सतत भाव लिए हुए अपने मामा कंस के परम शत्रु हैं। यदि वे अधर्म का अनुसरण करने वाले दुर्योधन के विनाश के समर्थक हैं, तो वे सत्ता और श्रेष्ठता के मद में चूर विनाश के पथ पर जाते हुए अपने ही वंश के कुछ अहंकारी योद्धाओं कोे उस महाविनाश से रोकने में तटस्थ हैं, जो उन जैसा मार्गदर्शक और त्राणकर्ता पाकर भी सन्मार्ग पर नहीं चल सके; और कदाचित् नारायणी-सेना के अपने ही यदुवंशीय गोप-क्षत्रिय योद्धाओं के युद्धोन्माद को भविष्य के लिए खतरा मानकर ही उन्होंने उन्हें दुर्योधन को देकर विनष्ट करवा दिया था। (अन्य कोई उचित कारण मैं नहीं समझ पाया और श्रीकृष्ण कुछ भी अकारण नहीं करते।)
      इन अनेक तथयों के दृष्टिगत, यह स्मरणीय व विचारणीय बिन्दु है कि ऐसे ग्रंथ जो समग्र-जीवन को उसकी सुंदरता और वीभत्सता के साथ नहीं अपनाते, उसका समर्थन नहीं करते, वे कृष्ण का भी समर्थन नहीं करते। जीवन के समस्त आग्रहों और दुराग्रहों के बीच श्रीकृष्ण केवल मुस्कुराते हुए प्रकट होते हैं। वे केवल आनन्दमग्न ही दृष्टिगोचर होते हैं-
नित्योत्सवो नित्यसौख्यो नित्यश्रीर्नित्यमंगलः।
      वे नित्य-उत्सव-स्वरूप, नित्य-सुख-स्वरूप, नित्य-शोभायुक्त और नित्य-कल्याणमय हैं। अतः जीवन का हर पहलू श्रीकृष्ण के सानिध्य में उत्सव बन जाता है। उनको पाकर व्रज-भूमि सुख और नित्य उत्सव की भूमि बन गयी है। अनासक्त कर्म ही उनकी समाधि है। वे जीवन से भागते नहीं, उसे अपनाते हैं। वे अथक संधिप्रयास के बाद भी महाभारत-युद्ध की स्थिति उत्पन्न हो जाने पर विचलित नहीं होते वरन् अपने बड़े भाई बलरामजी के इस युगधर्म स्वरूप महायुद्ध में तटस्थ रहने के निर्णय से प्रसन्न नहीं होते। अतः वे असमय उपस्थित हुई अर्जुन की छद्म-विरक्ति को तोड़ना अपना कर्त्तव्य समझते हैं। वे यथार्थ के ज्ञाता हैं, वे जीवन-रहस्य के ज्ञाता हैं।
      जन्म से मृत्युपर्यन्त कृष्ण सदैव झन्झावातों से घिरे दिखाई देते हैं। कंस की कारागार में जन्म लेने का समय ही झन्झावातों से प्रारम्भ होता है। कालिमामयी अर्द्धरात्रि, घोर घने बादलों से घिरा आकाश, कड़कती दामिनी, गरजते मेघ और गर्जना करती यमुना की जलधाराएँ, जिनके बीच से होकर एक व्यथित-हृदय पिता अपने प्रिय पुत्र को गोकुल अपने चचेरे भाई (शूरसेन के दूसरे पुत्र पार्जन्य के पुत्र), भाई से अधिक प्रिय मित्र, नन्दराय के घर एक आततायी के क्रोध से बचाने के निमित्त ले जा रहा होता है, समय की सिंहगर्जना प्रतीत होती हैं, जो यह घोषणा करती है कि जन्म लेने वाला जन्मना असाधारण है; उसका जीवन इन कठिनतम परिस्थितियों से हँसते हुए संघर्ष करने हेतु ही हुआ है। किसी शिशु के जीवन पर इतनी कम उम्र में इतने संकट नहीं आए! पूतना, तृणावर्त, शकट और फिर जैसे झड़ी लग गयी अनिष्टों और उत्पातों की! वक, प्रलम्ब, अरिष्ट, अघासुर और केशी; और फिर कंस का धैर्य भी जवाब दे गया। आखिर उसको अपनी मृत्यु का सामना स्वयं करना ही उचित जान पड़ा।
      इतने संकटों और अत्याचारों का सामना करते हुए प्रेम, संगीत और नृत्य का उद्घोष निश्चय ही असाधारण और अद्भुत है! अतः श्रीकृष्ण अलौकिक हैं। वे प्रेम और वैर को, बांसुरी के स्वरों और युद्ध के शंखनाद को अपने जीवन में असाधारण सहजता से अपनाते हैं। द्वन्द्वों के पार रहने की यह कला श्रीकृष्ण में जन्मना है।
      वास्तव में जीवन न संगीत है न युद्ध, न प्रेम है न वैर, जीवन तो इन सारे द्वन्द्वों से परे लहराता हुआ आनन्द का सागर है, जिसमें डुबकी लगाने की कला आने पर ही यह सफल है। श्रीकृष्ण का जीवन और उनका दर्शन मानवमात्र को इसी विरोधाभास के द्वन्द्वों से निकालने का साधन है। वह आनन्द-सागर तक ले जाने का सरल मार्ग है।
      ऐसा सब होते हुए भी श्रीकृष्ण के चरित्र पर अनेक आक्षेप है। उनके अनुयायी हों या विरोधी प्रायः सभी उन पर जाने-अनजाने दोषारोपण करते देखे गये हैं। यह ऐतिहासिक तथ् है कि महापुरुषों पर ईश्वरावतार होने का आरोपण कुछ सौ वर्ष ईसा पूर्व से लेकर गुप्तकाल तक चलता रहा और महाभारत तथा पुराणों के कलेवर में तत्कालीन लेखकों ने अपने युग तथा कहीं-कहीं निजी स्वार्थ से प्रेरित होकर पर्याप्त घालमेल किया, जिसके फलस्वरूप लगभग दस हजार श्लोकों वाला ‘जय काव्य’ पहले 28 हजार श्लोकों वाला ‘भारत’ तथा कालान्तर में एक लाख से अधिक श्लोकों वाला ‘महाभारत’ बन गया। दूसरे, मध्ययुग के भारतीय जनमानस में कुछ पाश्चात्य धर्म-संप्रदायों द्वारा प्रचारित की गयी ‘व्यक्तिगत ईश्वर’ की अवधारणा, धीरे-धीरे हिन्दू धर्म का भी अंग बन गयी, वह भी भगवान श्रीराम व श्रीकृष्ण संबन्धी हमारी धारणा को विकृत करने के लिए उत्तरदायी है; और फिर हमारी सांसारिक सुख की लालसा, स्वार्थसिद्धि की आकांक्षा और पौरुषहीनता ने ईश्वर के व्यापक स्वरूप को अत्यंत संकुचित और लौकिक बना दिया है, जिससे ईश्वर एक व्यक्ति विशेष के रूप में स्थापित हुआ सा लगता है, जो मानो सांसारिक मनुष्यों की भाँति पूजे जाने पर हमारी क्षुद्र कामनाओं को पूर्ण करने का साधन मात्र हो! श्रुति, उपनिषद और गीता जिस धर्म की अवधारणा को पुष्ट करते हैं, उसका आज के हिन्दू धर्म के प्रचलित स्वरूप से अधिक साम्य नहीं है।
      श्रीकृष्ण पर लगाये गये दोष हमारी रूढ़ि और संकुचित नैतिकता की अवधारणा से निकले हैं। श्रीकृष्ण पूर्णपुरुष हैं। उनमें मानव स्वभाव के सारे पक्ष समाहित हैं, किन्तु रूढ़ि नैतिकता के जाल में फँसा हुआ आज का जनमानस अपनी चारित्रिक दुर्बलताओं को श्रीकृष्ण के स्वाभाविक मानवीय गुणों पर आरोपित कर स्वयं को दोषरहित सिद्ध करना चाहता है; हाँ, एक दृष्टि से यह स्वाभाविक भी है- श्रीकृष्ण जितने ऐतिहासिक हैं, उतने ही वह मिथकीय भी हैं; और वे राजनयिक होने से पहले जननायक हैं, उनका जीवन एक सामान्य व्यक्ति के जीवन से पर्याप्त साम्य रखता है। अतः जनसाधारण को उनका जीवन अपने जीवन जैसा ही दिखता है। फलतः वह जब उन पर टिप्पणी करता है तो वह साधारण लोकदृष्टि होती है। यह श्रीकृष्ण के सरल व साधारण जीवन का ही आकर्षण है कि एक सामान्य व्यक्ति बेहिचक उनसे अपनी तुलना कर बैठता है!
      जहाँ तक आक्षेपों का प्रश्न है, वे हमारे भ्रमित मन द्वारा उस युग और युगधर्म को न समझ पाने के कारण प्रकट होने स्वाभाविक हैं। हम किसी भी ऐतिहासिक व्यक्तित्त्व को उसके युग नहीं, अपितु अपने युगाचार के अनुसार समझने की भूल कर बैठते हैं। दूसरी बात यह भी विचारणीय है कि हमारा प्राचीन इतिहास प्रायः काव्य के रूप में ही प्राप्त है, या यह कहें कि हमारे मनीषियों ने इतिहास को भी काव्यमय करके उसे आनन्दपूर्ण बनाने की चेष्टा की, जिससे उसमें लालित्य और अद्भुत-रस का समावेश तो हो गया, किन्तु उसे आने वाले युग की जड़ता ने कविहृदय होकर पढ़ने के बजाय एक छिद्रान्वेषी इतिहासकार की तरह देखने की गलती की और साथ ही इन ग्रंथों के अधिकांश व्याख्याकारों ने कवि-कल्पना को भी सत्य साबित करने का हठ किया, जिसका परिणाम यह हुआ कि अब आज की पाश्चात्य विवेचन शैली उसमें से कवि-कल्पना को तथ् मानकर देखती है और उसे असंभाव्यता के कुएँ में गिरा देती है तथा तथ् को कवि-कल्पना कहकर उसे संदेह के घेरे में खड़ा कर देती है। श्रीकृष्ण का जीवन-चरित ऐसी घटनाओं से भरा पड़ा है। मेरी व्यक्तिगत समझ मुझे तथ्त्मकता, आध्यात्मिक-रूपक अथवा कवि-कल्पना में भेद करने से रोकती है। श्रीकृष्ण का गोवर्धन-पर्वत को उंगली पर धारण करना तथा कौरव-सभा में विलाप करती हुई द्रौपदी के वस्त्र बढ़ाना अथवा विश्वरूप-दर्शन जैसे आख्यान इसी श्रेणी में रखे जा सकते हैं। काव्य-विधा की असीमितता को ध्यान में रखें तो इन पर सत्य और असत्य की बहस करना अपरिपक्वता और नासमझी ही कही जायेगी। एक बात यह भी है कि कृष्ण को ऐतिहासिक दृष्टि से देखने से उनका महत्व कम होकर केवल एक विषिष्ट राजपुरुष जितना ही रह जाता है, किन्तु श्रीकृष्ण जितने बाहर हैं- उससे अधिक पर्दे में हैं। इसलिए वे केवल इतिहास-पुरुष नहीं हो सकते। वे जननायक हैं, और सामान्य-जन के बीच जनश्रुति बनकर उनके जीवन में रच बस गये हैं। कृष्ण और उनसे जुड़े व्यक्तित्व, चरित्र तथा उनके जीवन से जुड़ी सामान्य घटनाएँ भी जनसाधारण के हृदय और जीवन-शैली में प्रविष्ट हो गयी हैं, भले ही उन्हें मान्य पुराणों और शास्त्रों का प्रामाण्य प्राप्त न हो।
      एक प्रसंग श्रीकृष्ण की बालसंगिनी श्रीराधा का लिया जा सकता है जिनके संबन्ध में प्रायः सभी मान्य पुराण मौन हैं। कृष्णकथा के प्रमुख श्रोत ‘विष्णुपुराण’ तथा ‘हरिवंशपुराण’ में श्रीराधा का रंचमात्र भी उल्लेख नहीं है, यहाँ तक कि उपरिलिखित पुराणों की तुलना में अपेक्षाकृत बाद में रचित ‘श्रीमद्भागवतपुराण’ भी श्रीराधा का स्पष्ट उल्लेख नहीं करता है। केवल मध्यकाल में लिखे गये ‘ब्रह्मवैवर्तपुराण’ (व कुछ अन्य पुराणों में) तथा जयदेवकृत ‘गीत-गोविन्द’ में उनका विस्तृत उल्लेख मिलता है, ‘ब्रह्मवैवर्तपुराण’ में उन्हें रायण वैश्य की पत्नी के रूप में व गोलोक-स्वामिनी के रूप में चित्रित किया गया है, जो आयु में श्रीकृष्ण से काफी बड़ी और युवती हैं। किन्तु आज के जनमानस में राधिकाजी का जो चित्र है- वह उनकी सहचरी किशोरी का है, जो उन्हीं की उम्र की कुमारिका हैं। अतः मैंने इसी रूप में श्रीराधा की अपने इस काव्य-प्रयास में आराधना की है, क्योंकि अब हरिप्रिया श्रीराधा का यह चित्र, चरित्र और व्यक्तित्त्व श्रीकृष्ण के जीवन का अभिन्न अंग बन गया है। लोक-झाँकियों और लोक-कथाओं में व्रजकिशोरी राधा के बिना श्रीकृष्ण का चित्र अधूरा प्रतीत होता है। इसलिए, अब यदि कोई राधा को कृष्ण से अलग करने का प्रयास करता है तो उसके इस कार्य को नासमझी के अलावा क्या कहा जा सकता है; क्योंकि जो जनसामान्य के हृदय में स्थान बना चुका हो, उस तथ् को कुछ ग्रंथों के आधार पर झूठा कहना अपने आप ही व्यर्थ हो जाता है।
      किंतु श्रीमद्भागवतपुराण के ग्रंथकार ने जिस रूपक के द्वारा गोपियों के वस्त्र-हरण के द्वारा परमात्मा के प्रति जीवात्मा के सम्पूर्ण समर्पण के रहस्य को समझाया है, वह साधारण सांसारिक मनुष्य के लिए समझना निश्चय ही दुष्कर है। ऐसे आख्यान उचित मार्गदर्शन व सम्यक दृष्टि के अभाव में जनसामान्य में भ्रांति उत्पन्न करने का साधन बन जाते हैं। अतः मैंने इस रूपक को इस जनभाषा की रचना में सम्मिलित नहीं किया है। यह भी दृष्टव्य है कि यह कथा श्रीमद्भागवत के अतिरिक्त श्रीकृष्णकथा के अन्य प्रमुख ग्रंथ विष्णुपुराण व हरिवंशपुराण सहित अन्य किसी प्रमुख ग्रंथ में नहीं है।
      एक प्रश्न श्रीकृष्ण की पत्नियों की संख्या को लेकर भी उठाया जाता है। सोलह हजार एक सौ आठ पत्नियों को तथ् मानना केवल तभी संभव है, जब श्रीकृष्ण को चमत्कारी ईश्ववर माना जाए। वे कन्याएँ, जिन्हें नरकासुर ने कैद कर रखा था और उसका वध करने के बाद जिनके पुनर्वास की व्यवस्था श्रीकृष्ण ने द्वारिका में की थी, उन्हें उनकी पत्नियाँ कहने का औचित्य विचारणीय है! यह समझा जा सकता है कि अपहृत कन्याओं का कैद से मुक्त होने के बाद उनके घर वालों के द्वारा स्वीकार किया जाना (जो आज के समाज में, जिसे हम प्रगतिशील और विकसित कहते हैं, कठिन है तो) उस समय मेें कितना दुष्कर रहा होगा। अतः भगवान का उनके विवाह व पुनर्वास की व्यवस्था करना सर्वथा पुण्यकारक सामाजिक आवश्यकता थी। अतः इस परिप्रेक्ष्य में ‘पति’ शब्द का अर्थ ‘राजा’ करना ही अधिक समीचीन लगता है। प्रश्न तो सोलह हजार की संख्या पर भी उठाया जा सकता है।
      थोड़ा सा विचार कृष्ण की पटरानियों की आठ की संख्या पर करना भी आवश्यक है। इनमें से तीन- रुक्मिणी, जाम्बवंती और सत्यभामा- ही ऐसी हैं जिनका श्रीकृष्ण के जीवन की अन्य घटनाओं से कोई सरोकार पुराणों व महाभारत में दर्शाया गया है। शेष पाँच का जिक्र केवल विवाह के होने तक ही सीमित है। हाँ, वे राजनैतिक सम्बन्ध दृढ़ करने की दृष्टि से अवश्य महत्वपूर्ण हैं।
      श्रीकृष्ण का इन्द्रप्रस्थ के निर्माण हेतु अर्जुन के माध्यम से खाण्डव-वन दाह कराने की घटना को आज वनों की कमी के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो अनुचित कार्य प्रतीत होगा, किन्तु उस युग में जब वनों की बहुतायत थी तो नयी मानव बस्तियों के निर्माण के लिए यह समय की महती आवश्यकता थी, तथा वे वन्य जातियाँ जो सभ्यता और संस्कार को ही अस्वीकार करती थी, उनका प्रतिकार करना भी शायद आवश्यक हो गया होगा। ऐसा नहीं है कि उनको समाज में सम्मिलित करने और मुख्यधारा में लाने के प्रयास नहीं हुए। श्रीराम ने वानर तथा ऋक्षादि-वंशीय वन्यजातियों को अपनी सेना में स्थान दिया था और उनके सहयोग से ही ब्राह्मण कुलोत्पन्न होने पर भी पथभ्रष्ट हुए रावण का प्रतिकार किया था। यदुवंशियों तथा स्वयं श्रीकृष्ण ने भी नाग व ऋक्ष आदि वन्य जातियों से सम्बन्ध दृढ़ करने की पहल की थी। वसुदेवजी की माता मारिषा नागवंश की थीं तथा स्वयं श्रीकृष्ण की पत्नी जाम्बवंती ऋक्षराज जाम्बवान की पुत्री हैं।
      कुरु-पाण्डव युद्ध के दौरान भीष्म, द्रोण व कर्ण का अनीति या छल से वध कराने का आरोप भी श्रीकृष्ण पर लगाया जाता है। किन्तु विचारणीय यह है कि यह तीनों महारथी जिस व्यक्ति के समर्थन में युद्ध भूमि में उतरे हैं, वह (दुर्योधन) अनेक गौण अपराधों व छल-छद्मों में लिप्त होने के साथ ही स्त्री व मातृ-अस्मिता को अपमानित करने के अक्षम्य अपराध के दण्ड का अधिकारी भी है; और ये महानुभाव अपनी प्रतिज्ञा, पुत्र-मोह, छद्म-मैत्री व अहंकारपूर्ण आत्म-सम्मान की आड़ में उस घोर अपराध का समर्थन करने के लिए स्वयं को विवश दर्शाते हैं। उन्हें अपनी प्रतिज्ञा, मोह व आत्म-सम्मान के समक्ष धर्म का न्यायपूर्ण पक्ष लेना गौण प्रतीत होता है। अपने इस पक्ष को सही साबित करने के लिए वे अनेक तर्कों का भी सहारा लेते हैं। किन्तु दूसरी तरफ श्रीकृष्ण का सम्पूर्ण जीवन इस बात का साक्ष्य बन गया है कि धर्म की संस्थापना में आड़े आने वाली प्रत्येक प्रतिज्ञा, मोह व निजी सम्मान महत्वहीन हैं। राधा और व्रजवासियों के निष्छल प्रेम तथा माता यशोदा के अतुलनीय वात्सल्य को भी श्रीकृष्ण ने एक प्रतिज्ञा की डोर में बाँधा था कि वे लौटकर पुनः वृन्दावन आयेंगे, किन्तु मातृभूमि तथा जन-समुदाय के प्रति अपने कर्त्तव्य के आवाह्न पर उन्होेंने इन सभी आत्मीयों के प्रति अपने प्रेम को, अपनी प्रतिज्ञा को बलिदान कर दिया। जरासंध जैसे अजेय प्रतिद्वंद्वी को सत्रह बार पराजित करने की क्षमता रखने वाले योद्धा श्रीकृष्ण केवल इसलिए अपने आत्मसम्मान को दाँव पर लगाकर रणछोड़ बन जाते हैं ताकि उनके कारण मथुरा के आम-जन को कष्टों का और सामना न करना पड़े। चंद्रवंशीय आभीर-क्षत्रियों की गोपालक-परम्परा वाले यदुकुल में उत्पन्न होने तथा समस्त वीरोचित गुणों की प्रतिमूर्ति होने के बावजूद उस समय के दिग्भ्रमित क्षत्रिय समाज ने उन्हें कभी एक क्षत्रिय जैसा सम्मान नहीं दिया, किन्तु श्रीकृष्ण कभी अपने कर्तव्य पथ से विमुख नहीं हुए। महारथी कर्ण जीवन भर अपने को सूतपुत्र के सम्बोधन से अपमानित महसूस करता रहा किन्तु कृष्ण ने कभी ‘गोप या ग्वाला’ कहे जाने को तिरस्कार नहीं समझा। उन्होंने स्वयं ‘सूत’ का कार्य अर्थात् अर्जुन का सारथय सहर्ष स्वीकार किया, जिसे कर्ण सहित अन्य (उदा0 राजा शल्य) क्षत्रिय योद्धा हेय समझते थे। धर्मयुद्ध के प्रमुख योद्धा अर्जुन को पूर्ण मनोयोग से युद्ध न करते देखकर उसे पुनर्बलित व प्रोत्साहित करने के लिए उन्होंने भारत युद्ध में शस्त्र न उठाने की अपनी प्रतिज्ञा भी तोड़ दी; जबकि विद्वान पितामह भीष्म हस्तिनापुर के सिंहासन से बँधे रहने की अंध-प्रतिज्ञा को न तोड़ सके, यद्यपि वह देख रहे थे कि राज्य की बागडोर गलत मानसिकता और अमानवीय राजनीति के हाथों की कठपुतली बन गयी है। आचार्य द्रोण का पुत्रमोह के कारण ब्राह्मणोचित मर्यादा से गिरकर पथ-भ्रष्ट क्षत्रिय-समाज की दासता स्वीकार करना ही उनके पतन का मूल कारण था। यदि शत्रु ने अधर्म की पराकाष्ठा कर डाली हो और फिर वह संकट काल मेें अपने बचाव के लिए धर्म की दुहाई देता है तो वह उसका नैतिक अधिकारी नहीं रह जाता।
      अतः यह तीनों योद्धा निश्चय ही अजेय थे, किन्तु तीनों ही नैतिक रूप से दुर्बल और टूटे हुए थे। पितामह काशि-राजकुमारियों विशेषत: अम्बा के प्रति अपने द्वारा किए गए अन्याय से पराजित हो चुके थे। आचार्य द्रोण भी ज्ञानी थे; वे जानते थे कि पुत्रमोह और राजा द्रुपद के प्रति अपने प्रतिशोध से उपजे क्रोध के कारण उन्होंने ब्राह्मण की गरिमा से इतर कार्य किया है, जो अक्षम्य है। अपने पितर व गुरु परशुराम का उदाहरण भी उनके सामने था, जिन्होंने शास्त्र के साथ शस्त्र तो धारण किया था, किन्तु केवल भटके हुए तत्कालीन क्षत्रिय-समाज को सन्मार्ग पर लाने के लिए (शेष 21 बार क्षत्रियों को नष्ट करने की असंभव कथा केवल अतिशयोक्ति का एक उदाहरण मात्र हैं)। अतः आचार्य की आत्मग्लानि ने उन्हें युद्ध से बहुत पहले ही मृत घोषित कर दिया था।
      महारथी कर्ण दानी था। उदार-हृदय था। अर्जुन के समकक्ष ही श्रेष्ठ धनुर्धर था। वह चाहता तो अपने बाहुबल व कौशल से स्वतंत्र रहकर भी अपना क्षत्रियत्व साबित कर सकता था। किन्तु वह दुर्याेधन की छद्म-मित्रता के जाल में जा पड़ा, जिससे निकलने का कोई सुगम मार्ग नहीं था। उसे अपने मित्र के दुष्कृत्यों का पूर्ण ज्ञान था, इसके बावजूद वह उसका समर्थन करने पर विवश था। नैतिक रूप से दुर्बल हुआ वह वीर केवल अपना बलिदान ही कर सकता था।
      किसी भी युद्ध को जीतने के लिए बाहुबल के साथ युक्तिबल भी अत्यावश्यक होता है, जो विशेषतया श्रीकृष्ण में था और उसका उन्होंने यथासमय उपयोग किया। यद्यपि महाभारत में युद्ध-धर्म की मर्यादा की बात कही गयी है, किन्तु सर्वविदित है कि युद्ध में कोई मर्यादा नहीं होती और किसी भी योद्धा ने उस महायुद्ध में किसी निर्धारित मर्यादा का पालन नहीं किया। सर्वप्रथम पितामह भीष्म ने ही विराटकुमार श्वेत पर ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करके युद्ध-धर्म की मर्यादा तोड़ी थी। कृष्ण यह जानते थे कि युद्ध अंतिम उपाय है- धर्म के पुनर्स्थापन का। उन्होंने साम, दाम और भेद की नीति के बार-बार विफल हो जाने के बाद ही विवशता में युद्ध का समर्थन किया। अतः गांधारी सहित अन्य का यह आरोप कि श्रीकृष्ण युद्ध को रोक सकते थे, भी सत्य नहीं है। श्रीकृष्ण ने सदैव परमात्म-तत्व का संबल लेकर ही अपने दायित्वों व सुकार्यों का निर्वहन किया। इसीलिए उन्होंने इसे अवश्यम्भावी जानकर कुमार्ग पर जाते हुए अपने पुत्रों, परिजनों व संबन्धियों को भी महाविनाश से बचाने का केवल सुधारात्मक प्रयास ही किया, उन्हें हठात् नहीं रोका। वे सच्चे अर्थों में समदर्शी हैं।
      यह सर्वथा विचारणीय तथ्य है कि श्रीकृष्ण के जीवन में अतिमानवीय तत्वों का समावेश देखकर उनके सामान्य मानुषीय कार्यकलापों पर एतराज व आक्षेप किया जाना स्वाभाविक तो हो सकता है, किन्तु इसे धर्मसंगत व न्यायोचित नहीं कहा जा सकता, क्योंकि अतिमानव भी मानव ही होता है। उसके भी बुद्धि और बल की एक निश्चित सीमा होती है। शान्ति-संदेश लेकर हस्तिनापुर जाने से पूर्व वे अर्जुन व युधिष्ठिर को संबोधित करते हुए मनुष्य-सामर्थ्य की विवशता और कर्तव्यपालन की परमावश्यकता को स्वीकार करते हैं। वे कहते हैं-
  .....अहं हि तत् करिष्यामि परं पुरुषकारतः।। दैवं तु न मया शक्यं कर्म कर्तुं कथंचन.....।।                             -म0भा0 उद्योग0 79/4-5।।
   (मैं पुरुषार्थ से जितना हो सकता है, उतना संधिस्थापन के लिए अधिक से अधिक प्रयत्न करूंगा; परंतु प्रारब्ध के विधान को किसी प्रकार भी टाल देना या बदल देना मेरे लिए सम्भव नहीं है।)
     अतः मानव-मर्यादा को सम्मान देने के साथ-साथ युगधर्म का निर्वाह करते हुए अनेक विषम परिस्थितियों में भी शाश्वत मानव-धर्म की प्रतिष्ठा करना श्रीकृष्ण जैसे महामानव के लिए ही सम्भव है। अखण्ड भारतवर्ष की परिकल्पना व धर्मराज्य की स्थापना मानव-सभ्यता के विकास में उनका अपूर्व योगदान है। निरंतर निष्काम-कर्म के मार्ग पर अग्रसर रहकर भगवान ने संसार को सतत कर्मशील रहने की महत्ता सिखाई। उनका मानव-दर्शन जनसाधारण के लिए मुक्ति का राजमार्ग है।
      किंतु भगवान श्रीकृष्ण के जीवन व दर्शन को सरल जनभाषा में उकेरने का मेरा यह प्रयास निश्चय ही दुःसाहसपूर्ण है, क्योंकि उनकी जीवन-लीलाओं का रहस्य समझना मुझ अज्ञानी के लिए सर्वथा असम्भव है। भगवान की लीलाएं अनंत हैं। यदि कोई विद्वान व्यक्ति उनका संकलन करना चाहे, तो उसके लिए भी यह असंभव की सीमा तक दुष्कर होगा; तो मेरी क्या बिसात है? किंतु भगवान के चरित्र का गान करने का लोभ संवरण नहीं कर सका; संसार को सन्मार्ग दिखाने वाले प्रभु श्रीकृष्ण के जीवन-चरित्र को लोक-जीवन तक पहुॅंचाने की इच्छा को रोक नहीं पाया और अपनी नगण्य क्षमता के अनुसार जैसा बन पाया, टूटी-फूटी ग्राम्य-भाषा में वैसा लिखने का प्रयास मैंने किया है।
      यह भी अक्षरशः सत्य है कि भगवान की लीलाओं का विस्तार अपार है, अतः रचना में केवल मुख्य कथानक को ही विस्तार दे पाया हूँ, कथा के विस्तार के भय से विवशता में अनेक कथा-अंशों को संक्षिप्त करना पड़ा है।
      अंत में, यही कहना चाहूँगा कि उपरोक्त बिन्दु विद्वानों के बीच चर्चा का विषय हो सकते हैं, किन्तु एक सहज और सर्वकल्याणाकांक्षी कवि-हृदय के लिए महत्वहीन हैं। इसलिए प्रभु श्रीकृष्ण के चरण-कमलों में यह काव्य-पुष्प समर्पित करना मुझ नगण्य जीव के लिए प्रेम-प्रेरित पुण्य-कार्य है। बचपन से ही कृष्ण मेरे प्रिय-आराध्य रहे है। यह मनमोहन की ही प्रेरणा और प्रताप है कि मुझ जैसा अल्पज्ञ ऐसा दुःसाहस कर रहा है। सामान्य-जन तक भगवान की पावन लीलाएँ और उनके प्रेरक चरित्र की एक झलक पहुँचा सकूँ, जिससे प्रेरणा पाकर दिग्भ्रमित मानवता का मार्गदर्शन हो; तथा परमात्मा का स्थूल स्वरूप मानव-संसार, जो अंशों में विभाजित होने से उसे ही अपना वास्तविक परिचय समझ बैठा है, भगवान के चरित्र और उपदेश से अपने अखंड स्वरूप के दर्शन कर कृतार्थ हो, यही मेरी एकमात्र कामना है। अतः भगवान व उनके भक्तों को प्रणामकर उन परम-प्रभु का कृपा-प्रसाद यह ग्रंथ उनके ही चरणों में समर्पित करता हूँ।
                         
                         श्रीकृष्णार्पणमस्तु!

-राजेन्द्र प्रसाद "निसेष"
श्रीकृष्णजन्माष्टमी
भाद्रपद, सं0 2078 वि0       
(सोमवार, 30 अगस्त 2021)