श्रीकृष्णचरितसुधा के कथानक व काव्य-सौन्दर्य की कुछ झलकियां
वृन्दावन में विचरण करते हुए श्रीकृष्ण का सौन्दर्य
(व्रजपर्व)
दो0- निरखन साे सुखधाम छबि भयउ सकल बनु नैन।
चले प्रात हलधर सहित देत सबहिं चित चैन।।150।।
चौ0-मोर मुकुट सिर सुन्दर सोहा। गर बन सुमन माल मन मोहा।।
जलद केस कुंचित घुघुवारे। तिलक भाल सुभ मात सँवारे।।
दृग बिसाल खंजन लखि लाजहिं। कुंडल लोल कपोल बिराजहिं।।
हनु हिय हरनि सुभग सुचि नासा। करहिं जगत बस भृकुटि बिलासा।।
अरुन अधर पट रस बस करहीं। जबहिं मुरलि मोहिनि सुर भरहीं।।
बिच रबि दमन दसन दमकाहीं। मदन कोटि मुख देखि लजाहीं।।
जानु जाहिं भुज बच्छ बिसाला। बृषभ कंध कटि केहरि चाला।।
पीत बसन कटि काछि सुहाई। बयस किसोर उठत तरुनाई।।
कृष्न कमल कल कोमल काया। कठिन काल खल कुमति निकाया।।
दो0- परत भूमि पंकज चरन ब्रज रज भई अनन्य।
देखि रेख जे जग चरहिं करहिं सुजीवनु धन्य।।151।।
चौ0-करहिं छाँह घन प्रभु मग जानी। उठेउ जागि कुलि बनु अगवानी।।
लखि घनस्याम मोर मुद नाचे। जिमि सत रूप देखि मुनि साँचे।।
नवहिं फलद तरुबर निज डारी। बोध पाइ जिमि गुर अबिकारी।।
मृग सस सिंह बिपुल बनचारी। अपलक ससि चकोर अनुहारी।।
बिसरि भाव निज बिचरत संगा। हरी बैर मति दरसन गंगा।।
प्रभु गुन रटहिं कुंज प्रति पाँँखीं। लसीं पात श्रुतिं जनु तनु राखीं।।
बिबिध रंग सुचि सुमन सँवारी। सजी धरनि धरि तन तृन सारी।।
भगति जुबति प्रति बपु अनुरागी। मनहु ठाढ़ि मति गति रति त्यागी।।
सुरभि पवन बन सकल सिंचाए। प्रान रूप हर जिमि जग छाए।।
दो0- एहि बिधि निरखत बिपिन छबि सखन्ह सहित ब्रजचन्द।
बिहरत बंसीबट निकट प्रगट अघट आनन्द।।152।।
श्रीकृष्णचरितसुधा- शान्तिपर्व: उद्धव गीता
दो0- सुभग भागवत धर्म बर प्रभु मुख मंजु प्रसाद ।
बरनउ सो भव भ्रम हरन हरि ऊधव संबाद ।।34।।
उस, प्रभु श्रीकृष्ण के मुख-प्रसाद, सांसारिक भ्रम का हरण करने वाले, श्रीहरि और उद्धवजी के संवादरूप सुन्दर व श्रेष्ठ भागवत-धर्म का वर्णन करिए।
चौ0- सुनि मुनि हृदय भयउ सुखु भारी। श्रीहरि चरन कमल उर धारी।।
ग्यानोदधि नृप बिनय बिचारी। आग्रह जानि लोक हितकारी।।
यह सुनकर ज्ञानसागर मुनिश्रेष्ठ शुकदेवजी के हृदय में अत्यंत सुख हुआ। उन्होंने श्रीहरि के चरण-कमलों को हृदय में धारण करके राजा परीक्षित की विनम्र-प्रार्थना का विचार करके और उनके आग्रह को संसार का हितकारक जानकर-
हरि हिय सुमिरि भागवत बोले। सुनहु बचन सुखसिंधु अमोले।।
निकट निरखि कृपालु कलि काला। ऊधव बोलि कहेउ नँदलाला।।
श्रीहरि का हृदय में स्मरण करके भागवत-वेत्ता शुकदेवजी बोले-राजन्! सुखसिंधु श्रीकृष्ण के अमूल्य वचन सुनिए-कलियुग का समय निकट आया जानकर कृपालु नन्दलाल ने उद्धवजी को बुलाकर कहा-
चले तात बदरीबन जाहू। अब न उदधिपुर अधिक निबाहू।।
ग्रसइ नगर बहु निकट सुनामी। जदुकुल होहि काल अनुगामी।।
हे तात! अब तुम बद्रिकाधाम चले जाओ, क्योंकि अब द्वारिकापुरी में अधिक समय तक निर्वाह होना कठिन है। बहुत शीघ्र ही इस नगर को समुद्री-चक्रवात ग्रस लेगा और वहाँ रहने वाले यदुवंशी मृत्यु का अनुगमन करेंगे।
जिन्ह बल गरबु सुनहिं मति नाहीं। कृत सात्यकि बिरोध बिनसाहीं।।
मैं निज परमधाम अब जाऊँ। सुख संदोह सहित बलदाऊँ।।
तुम्ह मम सखा ग्यान गुन जूहा। तजि कुल मोह सनेह समूहा।।
जिनमें बल का गर्व है, वे यादवगण बुद्धि की बात नहीं सुनेंगे और कृतवर्मा तथा सात्यकि की प्रतिस्पद्र्धा के कारण विनष्ट हो जायेंगे। अब मैं सुख-समूह बलभद्रजी के साथ अपने परमधाम चला जाऊँगा। तुम मेेरे प्रिय सखा और ज्ञान व गुणों का समूह हो, अतः मेरी राय है कि तुम यदुकुल के द्वारिका-समूह का मोह छोड़कर-
दो0- बिचरहु जग जुत अमिय घट भगति कर्म सुचि ग्यान ।
महिमामय परमेस गुन सुजन करायहु पान ।।35।।
भक्ति, कर्म और पवित्र ज्ञान के अमृत-घट को लेकर संसार में विचरण करो और महिमामय परमात्मा के गुणों का साधुजनों को पान कराना।
चौ0- सुनि प्रभु बचन बिबरन बिछोहा। कह सच्चिदानंद संदोहा।।
तुम्ह बिनु जियबु न मैं अनुमाना। तदपि कृपानिधि बचन प्रवाना।।
प्रभु श्रीकृष्ण के ये वचन सुनकर उद्धव उनके (संभावित) विछोह से विवर्ण होकर कहने लगे-हे सच्चिदानन्द-समूह! आपके बिना जीवित रहने का मैं अनुमान भी नहीं कर सकता! फिर भी कृपानिधि के वचन मेरे लिए आज्ञा हैं।
प्रभु जिय ठयउ तजबु संसारा। किमि कलि सुगम मनुज उद्धारा।।
जो मोहि दीन्ह त्याग उपदेसा। मोरेहिं कठिन चरत अखिलेसा।।
हे प्रभु! आपने संसार छोड़ने का निश्चय कर लिया है, किन्तु इस आने वाले कलियुग के समय में मनुष्य-मात्र का उद्धार कैसे सुगम हो सकता है? हे अखिलेश्वर! आपने जो मुझे त्याग-धर्म का उपदेश दिया है, उसका पालन करना तो मेरे लिए ही कठिन है!
किमि कलि मनुजँ सहज बिनु ग्याना। तरहिं त्याग अग उदधि जहाना।।
सरल सुमारग सबहिं सुहाना। दुर्गम सुगम चढ़त जेहि जाना।।
तो कलियुग के साधारण मनुष्य सरल ज्ञान के बिना त्यागरूपी अगम्य समुद्र को कैसे पार कर सकेंगे? इसलिए उन सबके लिए कोई सरल सुन्दर मार्ग जिसका पालन सभी के लिए सुगम हो, जिस जलयान पर चढ़कर दुर्गम्य (मुक्ति-मार्ग), सुगम्य बन जाए-
सहज सो कहहु कृपानिधि मोहीं। जेहि कृतकृत्य जीव जग होहीं।।
जेहि प्रभु मनुज मात्र कल्याना। सो सुपंथ बरनहु भगवाना।।
हे कृपानिधि! मुझे वह सरल स्वाभाविक धर्म बताइए, जिसे पाकर संसार में जीव कृतकृत्य हो जाएँ। हे प्रभु! जिससे मनुष्य-मात्र का कल्याण हो, भगवन्! उस सुन्दर मार्ग का मुझे उपदेश करें।
दो0- सखा बचन सुनि पुलकि हरि कहेउ श्रेय संकल्प ।
तुम्ह संतत जग हित निरत हृदय न स्वारथ स्वल्प ।।36।।
सखा उद्धव के वचन सुनकर प्रसन्न होकर श्रीहरि ने कहा-तुम्हारा संकल्प कल्याणकारी है। तुम निरन्तर संसार के हित में लगे हुए हो, तुम्हारे हृदय में थोड़ा सा भी स्वार्थ नहीं है।
चौ0- कहउँ तात इतिहास पुराना। दत्तात्रेय देखि भगवाना।।
ऐसेहि प्रस्न भूप जदु कीन्हा। तुम्ह लगि ताहि उचित मैं चीन्हा।।
हे तात! मैं तुम्हें एक प्राचीन इतिहास कहता हूँ-(अत्रिपुत्र) भगवान दत्तात्रेय को आया हुआ देखकर ऐसा ही प्रश्न राजा यदु ने भी किया था। तुम्हारे लिए मुझे वही (प्रसंग कहना) उचित लगता है।
सोइ अवधूत नृपति संबादा। कहउँ हरन संसृति अवसादा।।
सुनहु सचेत सखा मन लाई। लखि एकदा अत्रिसुत भाई।।
निर्भय चरत जगत अबिकारा। उठि जजातिनंदन बिनु बारा।।
मैं वही संसार के दुःख का हरण करने वाला अवधूत दत्तात्रेय और राजा यदु का संवाद कहता हूँ। हे सखा! तुम चैतन्य होकर मन लगाकर सुनो-एक बार विकाररहित अत्रिपुत्र दत्तात्रेय को संसार में निर्भय विचरण करता हुआ देखकर ययातिनन्दन राजा यदु ने बिना देर किए उठकर-
नाइ चरन सिरु कीन्ह प्रनामा। पुनि अस प्रस्न कीन्ह बलधामा।।
कर मोहि चकित जोग मुनि साधा। बिचरहु तुम्ह जग अभय अबाधा।।
बिहित कर्म बिनु बाल समाना। तजि प्रबृत्ति इच्छा अरु माना।।
उनके चरणों में सिर झुकाकर प्रणाम किया और फिर बलधाम राजा यदु ने इस प्रकार प्रश्न किया-हे मुनि! आप जिस योग-मार्ग की साधना कर रहे हैं, वह मुझे चकित कर रहा है! आप संसार में विहित कर्म किए बिना ही एक बालक के समान प्रवृत्ति, इच्छा और अभिमान त्यागकर भय व बाधारहित विचरते रहते हैं।
निरति बिरति तव लखि मति माती। रहित बिकार मुकुत सब भाँती।।
सक न जगत संताप गरासी। अकथ अनंद रूप अबिनासी।।
आपकी निरति और वैराग्य को देखकर मेरी बुद्धि मोहित हो रही है। आप विकाररहित और सब प्रकार से मुक्त हैं। आपको संसार के संताप नहीं ग्रस सकते। आप अकथ, आनन्दस्वरूप और अविनाशी हैं!
दो0- अनुभवगम्य अनंद सो किमि नर लहहिं मुनीस ।
निजानंद निरुपाधि तुम्ह परम ग्यान बारीस ।।37।।
हे मुनीश्वर! आप आत्मानन्दयुक्त, बाधारहित और परमज्ञान के सिंधु हैं, (कृपया बताइए कि) वह (वैयक्तिक) अनुभवगम्य आनन्द मनुष्य कैसे प्राप्त कर सकते हैं?
चौ0- कह मुनि बिहँसि भूप मतिधीरा। जोग जतन अति सहज सरीरा।।
जो चह प्रगति मनुज संसारा। नित नहाइ तप सुरसरि धारा।।
मुनि दत्तात्रेय ने हँसकर कहा-हे धैर्यबुद्धि राजन्! इस मनुष्य शरीर में योग-प्रयत्न अत्यंत सरल है। यदि मनुष्य संसार में प्रगति चाहता है, तो उसे नित्य तप (परिश्रम) रूपी गंगा की धारा में स्नान करना चाहिए।
मन सुचि मनुज करइ मनुसाई। पुरुषारथ नर जगत भलाई।।
जग भल करत अपन भल होई। निजानंद सुख पावइ कोई।।
पवित्र मन से मनुष्य को पुरुषार्थ करना चाहिए, क्योंकि मनुष्य के पुरुषार्थ से ही संसार का कल्याण होता है। संसार का भला करते हुए अपना भी भला होता है, ऐसा करते हुए (बहुत प्रयत्न करके) कोई-कोई मनुष्य आत्मानन्द का सुख भी प्राप्त कर लेता है।
पै भूपाल छनिक सुख याहीं। परुपकार जौ लगि मन माहीं।।
सोउ करत संसय अहँकारा। तेहि फल काम बाम बरियारा।।
किन्तु राजन्! इस प्रकार के तप और प्रयत्न में मनुष्य को जो आनन्द प्राप्त होता है, वह क्षणिक ही होता है। वह भी तब तक ही मिल सकता है, जब तक मनुष्य के मन में परोपकार की भावना रहती है। किन्तु परोपकार करते हुए भी मनुष्य को अहंकार हो जाने का संदेह रहता है, और अहंकार का परिणाम (सकाम) इच्छाएँ हैं, जो मनुष्य को उल्टी दिशा में (कल्याण के बजाय, विनाश की ओर) ले जाती हैं। ये बहुत बलशाली होती हैं।
जौ कामना मनुज मन रहई। बार बार एहि सुख दुख लहई।।
केवल मुकुत भए दुख जाहीं। मुकुति भूप कहँ संसृति माहीं।।
यदि मनुष्य के मन में कामना है, तो इससे वह बार-बार सुख अथवा दुःख प्राप्त करता है। राजन्! केवल मुक्त होने पर ही दुःख समाप्त होते हैं, और सांसारिकता में रहते हुए मुक्ति कहाँ है?
जब लगि नर न ब्रह्म जग जाना। तब लगि सुधा सरिस बिष बाना।।
तन मन दहइ बंध नर डारी। मरि मरि जियइँ जीव संसारी।।
जब तक संसार में रहकर मनुष्य ब्रह्म को नहीं जानता, तब तक अमृत भी विष-वाण की तरह मनुष्य को बंधन में डालकर शरीर और मन को जलाता रहता है और सांसारिक मनुष्य मर-मरकर जीते रहते हैं!
जब संसार ईसमय होई। सम्यक दीठि मनुज मति धोई।।
प्रभु प्रघोष जड़ जंगम जानी। सब महुँ सुनहि आत्म बर बानी।।
किन्तु जब यही संसार मनुष्य के लिए परमात्मामय हो जाता है, तो सम्यक-दृष्टि से मनुष्य की बुद्धि प्रक्षालित हो जाती है। तब वह संसार के समस्त जड़, (स्थावर), व जंगम प्राणियों को परमात्मा की ध्वनि जानकर सब में परमात्मा की श्रेष्ठ वाणी सुनता है।
ऊँच नीच बड़ अछोट बिचारा। बीतइ प्रभु प्रसार संसारा।।
कन कन प्रभु सरूप सिख देई। जान प्रान भवसागर खेई।।
किए भूप मैं गुर चौबीसा। उत्तम अधम जानि जगदीसा।।
यह संसार प्रभावशाली आत्मा का ही प्रसार है-ऐसा जानकर ऊँच-नीच और बड़े-छोटे का विचार समाप्त हो जाता है। कण-कण में व्याप्त परमात्मा का स्वरूप मनुष्य को शिक्षा देता है; यही वह जलयान है, जो मनुष्य को भवसागर से पार करता है। हे भूपाल! मैंने (संसार की दृष्टि में) उत्तम अथवा अधम कहे जाने वाले समस्त प्राणियों को परमात्म-स्वरूप जानकर चैबीस गुरु बनाए हैं।
दो0- करहि पार भव एक गुर मैं कीन्हे चैबीस ।
फिरउँ जगत निर्द्वंद जिमि सिसु स्वछंद अवनीस ।।38क।।
हे भूमिपति! एक गुरु ही संसार-सागर से पार करने में समर्थ है, मैंने तो चौबीस किए हैं और संसार में निर्द्वंद और शिशु के समान विचरता हूँ।
धरा अनिल नभ जल अनल रबि ससि जलधि पतंग ।
अजगर कुरर कपोत मृग सिसु मरकटि गय भ्रंग ।।38ख।।
पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, अग्नि, सूर्य, चन्द्रमा, समुद्र, पतंगा, अजगर, कुरर पक्षी, कबूतर, हिरन, बालक, मकड़ी, हाथी, भ्रमर-
चौ0- सरकर सर्प मीन मधुहारी। भृंगी बारांगना कुमारी।।
ए मम गुरू देहिं नित सिच्छा। जिय महीस करि देखु परिच्छा।।
वाण बनाने वाला, सर्प, मछली, मधु निकालने वाला, भृंगी कीट, पिंगला वेश्या, व कन्या-ये सब मेरे गुरु हैं, जो मुझे नित्य शिक्षा देते रहते हैं। राजन्! आप भी परीक्षा करके देख लें।
धीरजु छमा धरनि बर धर्मा। सरिस मात सेवहि निष्कर्मा।।
बात भेद बिनु राखहि प्राना। रंक राय बड़ छोट न जाना।।
धैर्य और क्षमा पृथ्वी के श्रेष्ठ धर्म हैं और वह माता के समान निष्काम-भाव से सेवा करती है। वायु बिना भेद-भाव के सभी के प्राणों की रक्षा करती है, वह राजा या रंक, बड़े या छोटे का भेद नहीं जानती!
गहइ न गुन सबु धारन करई। मंद मोद दोउ गंध बिचरई।।
रह अनंत निज सबहिं समाई। अमित अखंड रहइ न अघाई।।
वह किसी पदार्थ के गुणों को (चिरकाल के लिए) धारण नहीं करती, किन्तु सभी के गुण आसानी से धारण कर लेती है। अच्छी और बुरी दोनों प्रकार की गंधों में विचरण करती है। आकाश (शून्य होकर भी) सबको अपने में समा लेता है। वह अपरिमित और अखण्ड है, कभी तृप्त नहीं होता है।
सलिल सदा सुचि बात समाना। करइ परस पावन जग जाना।।
अगिनि तेजु अतप रूप सो मोहीं। साध तपत तेजमय होहीं।।
जल भी सदैव वायु के समान ही पवित्र रहता है और संसार जानता है कि वह अपने स्पर्श से पवित्र कर देता है। अग्नि संसार का तेज है, वह मेरे लिए तप का रूप है। साधक तप करके तेजयुक्त हो जाते हैं।
इरिषा द्वेष बिषय बिष नाना। करहिं सो भसम कृसानु समाना।।
निज द्युति सकल लोक आलोके। बिबस्वान गुन जगत बिसोके।।
वह तपश्चर्या-ईर्ष्या, द्वेष व नाना प्रकार के विषयरूपी विषों को अग्नि के समान ही भस्म कर देती है। सूर्य ने प्रकाश से समस्त लोक को आलोकित किया है और अपने (अपार शक्तिरूपी) गुण से वे उसे शोकरहित करते हैं।
उरजा अमित सबहिं गति देहीं। सेवत सकल दैन्य हरि लेहीं।।
तस नर ग्यान बिहान प्रकासा। हरि उर तमस भरहिं बिस्वासा।।
वे अपनी असीमित ऊर्जा से समस्त पदार्थों व प्राणियों को गति प्रदान करते हैं। वे (उनकी धूप का) सेवन करने वाले समस्त जगत की दीनता का हरण कर लेते हैं। वैसे ही मनुष्य भी ज्ञान की सुबह के प्रकाश से हृदय के अंधकार का हरण करके विश्वास से भर जाते हैं।
दो0- सरिस चंद नर चहिअ हिय घटत बढ़त गुन एक ।
बरसइ सीतलता सुधा जस समाइ सबिबेक ।।39।।
मनुष्य का हृदय चंद्रमा के समान होना चाहिए, जो घटने या बढ़ने पर (उन्नति या अवनति की दशा में) एक ही गुण दर्शाए अर्थात् समान रहे। उसकी जैसी सामर्थ्य हो, उससे विवेकानुसार शीतलता का अमृत बरसाए।
चौ0- अपर एक नृप गुन ससि पाहीं। बढ़त न अहमु घटत दुखु नाहीं।।
भेद एक भूपति उर धरही। प्रति छन मनुज चंद जिमि मरही।।
हे नरेश! चंद्रमा के पास एक और गुण है कि उसको बढ़ने पर अहंकार या घटने पर दुःख नहीं होता है। हे भूपाल! यह एक रहस्य हृदय में रख लो कि चंद्रमा के समान ही मनुष्य भी प्रतिक्षण मरता है अर्थात् क्षीणता को प्राप्त होता रहता है।
सतत सृजनु देखत नर नाहीं। यह मैं सीख लीन्ह ससि पाहीं।।
बिबस बिमोह मूढ़ नहिं चेता। जीवनु मरनु काल नित देता।।
और निरन्तर सृजित भी होता रहता है-मनुष्य यह नहीं देखता। किन्तु मैंने चंद्रमा से यही शिक्षा ली है कि मोह में पड़े हुए मूर्ख मनुष्य को पता नहीं चलता कि समय उसे जीवन और मृत्यु दोनों नित्य (प्रतिक्षण) ही दे रहा है!
कला जथा ससि नृप आभासी। तथा मृत्यु जीवन दोउ हाँसी।।
मैं अखंड पूरन अबिनासी। सुंदर सिख ससांक परकासी।।
किन्तु हे नरेश! जैसे चंद्रमा की कलाएँ आभासमात्र हैं, वे वास्तविक नहीं हैं अर्थात् वह वास्तव में छोटा या बड़ा नहीं होता, उसी प्रकार मृत्यु और जीवन भी हँसी मात्र हैं अर्थात् वास्तविक नहीं हैं। मैं अखण्ड, पूर्ण और अविनाशी आत्मा हूँ-ऐसी सुन्दर शिक्षा चंद्रमा देता है।
सिखव सिंधु मरजाद अतींवा। घटइ बढ़इ जलु तजइ न सींवा।।
उपर तरंगित हिय गंभीरा। गहहि सकल नहिं छाँड़इ धीरा।।
समुद्र हमें मर्यादा में रहना सिखाता है, वह (सामान्य स्थिति में) अपनी तट-सीमा को नहीं छोड़ता, चाहे उसमें जल घट जाए या अधिक हो जाए। वह ऊपर से तरंगित (चंचल) दिखाई देता है, किन्तु हृदय से गंभीर (गहरा) होता है। वह सब कुछ ग्रहण कर लेता है, अधीर नहीं होता!
रतन खानि पैठत कोउ पावा। जो तेहि हृदय परसि हरषावा।।
गुर तेहि मेल भूप जग सोहा। पिचुल सिष्य सेवहिं गत मोहा।।
वह रत्न की खानि है, किन्तु उसमें डूबकर ही कोई एक-आध व्यक्ति उसके रत्नों को प्राप्त करता है-जो उसके हृदय का स्पर्श करके उसे प्रसन्न करता है। हे भूपाल! गुरु भी समुद्र की तरह ही होता है, (ज्ञानरूपी रत्न पाने के लिए) शिष्यरूपी गोताखोर मोहरहित होकर उसका सेवन करते हैं।
अजित अपार असीम अथाहा। सागर सरिस ग्यान नरनाहा।।
अजगरु काल सकल जग खाई। बिषय तमस परि नर मुख जाई।।
हे राजन्! जिस प्रकार समुद्र अजेय, अपार, सीमारहित और अथाह है, उसी सागर की तरह ज्ञान भी अपरिमित है। समयरूपी अजगर सारे संसार को खा जाता है। विषयरूपी अंधकार में विचरता हुआ मनुष्य उसके मुँह में जा पड़ता है।
काल अतीत आत्म सरनाई। ग्यान प्रदीप्त पंथ सुखु भाई।।
कुरर मांस तजि राखहि प्राना। तस नर बिषय तजत सुखु जाना।।
आत्मा की शरण कालातीत होती है। ज्ञान से प्रकाशित मार्ग पर चलने में ही आनन्द है। जिस प्रकार कुरर पक्षी मांस छोड़कर अपने प्राण बचाता है, वैसे ही विषयों से छूटा हुआ मनुष्य ही सच्चे सुख को जान पाता है।
अत्यासक्ति जीव दुख देई। जिमि कपोत संसृति सुख सेई।।
परेउ जाल बड़ि संतति मोहा। बुधि भ्रम बिछत ब्यथीत बिछोहा।।
चरत मुकुत नर जीवनु जाना। साधन साधि करत दुख नाना।।
हे नरेश! संसार से अति-आसक्ति जीव को दुःख देती है, जैसे सांसारिक सुखों का सेवन करके भ्रम से विक्षत की गई बुद्धि वाला और संतति-विछोह से व्यथित हुआ एक कबूतर मोह के वृहद् जाल में पड़ गया था। संसार मे मुक्त होकर विचरण करने वाला मनुष्य ही वास्तव में जीवन को समझता है। इस जीवनरूपी साधन को साध्य समझकर व्यवहार करने से नाना प्रकार के दुःख प्राप्त होते हैं।
दो0- मीन मतंग पतंग मृग भृंग दीन्हि सिख मोहि ।
स्वाद परस छबि नाद रस बिषय मनुज बड़ द्रोहि ।।40।।
मछली, हाथी, पतंगा, हिरन और भ्रमर ने मुझे यह शिक्षा दी कि स्वाद, स्पर्श, सुन्दरता, नाद और रस आदि विषय मनुष्य के बड़े द्रोही हैं।
चौ0- एक एक इन्ह करहिं बिनासा। नर बस पंच न कवनिउँ आसा।।
बिषय बिराग राग दोउ छूटे। केवल मनुज आत्म सुख लूटे।।
इनमें से एक-एक विषय में ही इन जीवों की आसक्ति है, किन्तु वह अकेला विषय ही इनका विनाश कर डालता है-मनुष्य तो पाँचों विषयों के वश में है, फिर उसके बचने की क्या आशा है? विषयों के राग और विराग दोनों से छूटे हुए मनुष्य ही आत्मानन्द पा सकते हैं।
बाल सुभाउ हरइ मन ब्रीड़ा। निज महुँ मगन निरति निज क्रीड़ा।।
नहिं चित धरहि मान अपमाना। अरि न मीत मुख मधुर मोहाना।।
(फिर) शिशु का स्वभाव मन की व्यर्थ लज्जा को मिटा देता है। शिशु स्वयं में मग्न रहता है और अपने खेल में ही उसकी निरन्तरता रहती है। वह अपने चित्त में मान-अपमान की बात नहीं रखता। उसका न कोई शत्रु होता है, न मित्र-जो मधुर मुख वाला हो, वह उसी पर रीझ जाता है।
तस बिचरउँ मन रोषु न रागा। निर्बिकार हित आतम लागा।।
जिमि मर्कटी रचइ मुख जाला। बँधेउ जगत माया प्रभु माला।।
वैसे ही मैं भी शिशु की तरह मन में बिना अनुराग या क्रोध लिए निर्विकार होकर आत्म-कल्याण में लगा रहता हूँ। (आगे) जैसे मकड़ी अपने मुख से जाल बुनती है, उसी प्रकार संसार प्रभावशाली परमात्म-तत्त्व की माया के (द्वारा बुने हुए) जाल-मालिका में बँधा रहता है।
निर्भरादि संबंध अनेका। भूपति जग प्रसार प्रभु एका।।
पसरइ धरइ हरइ रचि हरई। अदभुत रचइ बहुरि निरुबरई।।
हे भूपाल! जीवों में परस्पर निर्भरता आदि के अनेक सम्बन्ध होते हैं, क्योंकि संसार के प्रसार में एक ही प्रभावशाली तत्त्व है। वह परमात्मा स्वयं (जगत के रूप में) अपना प्रसार करता है, फिर इसे धारण करता है, हरण करता है, और रचना करके पुनः हरण करता है। वह अद्भुत रचना करता है, फिर इसे मिटा देता है। (यह क्रम चलता रहता है।)
यह लखि ग्यानि मोह नहिं परई। तेहि महुँ जियइ ताहि महुँ मरई।।
लखेउँ बानकर रति निज काजू। लखेसि न सदल जात महराजू।।
अस प्रभु निरति मुकुति नर केरी। सुगति आत्मरत परइ न देरी।।
अतः इसे देखकर ज्ञानी मोह में नहीं पड़ता है। वह उसी परमात्मा में जीता है, और उसी में मरता है। (एक बार) मैंने वाण बनाने वाले की अपने काम में निमग्नता देखी, उसने अपने सामने से सेना सहित जाते हुए राजा को भी नहीं देखा! इसी प्रकार परमात्मा में (अबाध) निरति होने से मनुष्य की मुक्ति होती है। आत्म-निरत मनुष्य की उत्तम गति में देर नहीं लगती।
दो0 कहइ सर्प नरपति सुनहु धरहि जो नर सन्यास ।
बिचरइ सतत अकेल जग मठ मंडली बिनास ।।41क।।
हे राजन्! सुनिए-सर्प यह कहता है कि जो मनुष्य सन्यास धारण करे, वह सदैव संसार में अकेला ही विचरण करे, क्योंकि मठ और मण्डली में निवास करना-सन्यासी का विनाश कर देता है।
जो घरु बारु पियारु जिय तौ गृहस्थ भल भूप ।
मठ रचि परि सोइ मोह क्यों भ्रष्ट करइ तप रूप ।।41ख।।
यदि मनुष्य के मन में घर-बार के प्रति ही प्रेम हो, तो उसका गृहस्थ रहना ही ठीक है। मठों की रचना करके फिर से उसी गृहस्थी के (जैसे) मोह में पड़कर वह तपस्या के स्वरूप को भ्रष्ट न करे!
चौ0- रहित प्रमाद चरइ सत पंथा। अपरिग्रही तन पहिरइ कंथा।।
परिग्रह अधिक तात सुभ नाहीं। चुनि मधु कीट धरहिं छत माहीं।।
सन्यासी प्रमादरहित होकर सत्यमार्ग पर चले। अपरिग्रही मनुष्य को ही सन्यासी के वस्त्र धारण करने चाहिए। हे तात! अधिक (सांसारिकता का) संचयन किसी के लिए भी कल्याणकारी नहीं है, मधुमक्खियाँ अपने छत्ते में शहद एकत्र करती हैं-
श्रम संचित छँड़ाइ मधुहारी। बंचित करइ तिन्हइ दुख डारी।।
उचित पलइ कुल साधु अघाहीं। सूम कुधन सैतानहिं खाहीं।।
उस श्रम से संचित किए गए मधु-कोष को शहद निकालने वाला चुराकर उनको दुःख में डालकर उन्हें उनके परिश्रम के फल से वंचित कर देता है। धन उतना ही उचित है, जितने में अपना परिवार पल जाए और सज्जनों का आतिथ्य हो सके; कृपण के गलत साधनों से कमाये गए धन का उपभोग दुष्टजन ही करते हैं।
परिग्रह परत मरत सन्यासी। अपजसु अहंकार धन फाँसी।।
भृंगी कीट नीड़ निज धरईं। ते भय भजत रूप तेहि भरईं।।
सांसारिक-संग्रह में पड़कर सन्यासी नष्ट हो जाता है, उसके लिए यह जीवन धन, अहंकार और अपयशरूपी पाश बन जाता है। (ऐसा कहा जाता है कि) भृंगी नामक कीट अन्य कीटों को पकड़कर अपने आश्रय में ला रखते हैं, और वे कीट उसके भय का स्मरण करते-करते उसी भृंगी-कीट का स्वरूप हो जाते हैं!
जो कोउ भजइ आत्म भरि भाए। काहे न रहइ परम पद पाए।।
तात पिंगला सन मैं जाना। एक आस समरथ भगवाना।।
तो यदि कोई परमात्म-तत्त्व का भावपूर्ण होकर भजन करे, तो उसे परमपद मुक्ति की प्राप्ति क्यों नहीं होगी? अर्थात् वह क्यों न परमात्म-स्वरूप हो जाएगा? हे तात! पिंगला वेश्या से मैंने यह सीखा कि एक समर्थ परमात्मा ही मनुष्य का वास्तविक आश्रय है।
जगत कुआस सांति हरि लेई। आत्मानंद निरति भव खेई।।
जीवत जगत निजाश्रय प्रानी। लहहिं सुभग सुख सांति सुहानी।।
संसार से आशा करना-उसके पूर्ण न होने पर मनुष्य की शान्ति को हर लेता है। आत्मानन्द में निरति ही संसार में (कष्टों से) पार ले जा सकती है। आत्माश्रय में रहने वाले प्राणी ही संसार में रहते हुए सुन्दर और सुख देने वाली सुहावनी शान्ति प्राप्त करते हैं।
लखि गृह अतिथि अकेलि कुमारी। तिन्ह सत्कार हृदय निज धारी।।
कूटत धान भवन मैं देखी। बजत कंबु कंकन कर पेखी।।
एक बार एक घर में एक अकेली कन्या को मैंने अतिथियों को आया हुआ देखकर उनके सत्कार का विचार हृदय में रखकर धान कूटते हुए देखा। उसने अपने हाथों में शंख की चूड़ियाँ बजते देखकर-
बिबस लाज एक एक दुहुँ छोरे। खीझि रिसाइ अपर सब तोरे।।
भए मूक तिन्ह खनक बिलानी। सीख भूप यह मैं उर आनी।।
इस कारण से लज्जावश होकर कि अतिथियों को इनकी ध्वनि से पता चल जाएगा कि घर में पकाने योग्य धान्य उपलब्ध नहीं है, उसने खीझकर गुस्से से दोनों हाथों की अन्य सारी चूड़ियाँ तोड़ दीं, केवल दोनों हाथों में एक-एक ही रखीं। इससे चूड़ियों का खनकना बंद हो गया, वे निःशब्द हो गईं। हे भूपाल! मैंने यह शिक्षा हृदय में रख ली कि-
जहँ मत एक कलह तहँ नाहीं। मत अनेक परिवारहिं खाहीं।।
जती अकेल सोह संसारा। बहु जोगी मठ करहिं उजारा।।
भजे एक जग सान्ति नरेसा। चित चंचल जन परहिं कलेसा।।
जहाँ एक मत होता है, वहाँ कलह नहीं रहती और अनेक मत परिवार (संस्था) को निगल जाते हैं। सन्यासी भी संसार मे अकेला ही सोहता है, बहुत से सन्यासी मठ को ही उजाड़ देते हैं। हे नरेश! इसलिए एक (परमात्मा) को भजने से ही शान्ति मिलती है। चंंचल चित्त वाले (द्विविधाग्रस्त) मनुष्य क्लेश में पड़ जाते हैं।
दो0- एक ब्रह्म एकहिं निरति एक जानि संसार ।
होहिं ग्यानि जे आत्मरत होहिं सिंधु भव पार ।।42।।
इसलिए ब्रह्म एक है, एक ही में निरन्तरता होनी चाहिए। संसार (ब्रह्माण्ड) एक अखण्डित इकाई है-ऐसा जानकर जो ज्ञानी मनुष्य आत्मरत होते हैं, वही (मुक्तावस्था प्राप्तकर) संसार-सागर से उतर जाते हैं।
चौ0- अस मैं नृपति बहुत गुर कीन्हे। संसृति फिरउँ एक चित दीन्हे।।
यह संसार प्रगट जगदीसा। जो एहि सीख रहइँ धरि सीसा।।
हे राजन्! इस प्रकार मैंने बहुत से गुरु किए, तब मैं संसार में एक ही परमात्मा में मन लगाकर (निर्भय) विचरता हूँ। यह जगत प्रकट परमात्मा है-जो मनुष्य इस संसाररूपी परमात्मा की शिक्षा को शिरोधार्य करते हैं-
होहिं मुकुत बिचरत संसारा। छुवहिं न बिषय बिमोह बिकारा।।
अस अत्रेय महामुनि ग्यानी। नृप सिख देइ तजी रजधानी।।
वे संसार में रहते हुए ही मुक्त हो जाते हैं। उन्हें विषयों के विकार और मोह छू भी नहीं पाते। इस प्रकार अत्रिपुत्र महामुनि दत्तात्रेय ने राजा यदु को उत्तम शिक्षा देकर राजधानी त्याग दी अर्थात् वहाँ से (अन्यत्र) चले गए।
ऊधव मनुज निरत कल्याना। चरहि धर्म पथ मोर बखाना।।
तजइ कर्म नर जगत बिरोधी। धरहि धर्म एहि मति चित सोधी।।
भगवान श्रीकृष्ण बोले-हे उद्धव! आत्म-कल्याण में लगा हुआ मनुष्य मेरे कहे हुए धर्ममार्ग पर चले। वह संसार-विरोधी कर्मों को त्याग दे और धर्म को इसी बुद्धि के अनुसार सोच-समझकर धारण करे।
जग जगदीस भिन्न जेहि जाना। तेहि अति कठिन आत्म कल्याना।।
भगत मोर उर बयरु न रागा। समदरसी सबकें हित लागा।।
जिसने जगत और जगदीश्वर को अलग-अलग समझकर देखा है, उसके लिए आत्म-कल्याण कठिन है। मेरे भक्त के हृदय में वैर और राग नहीं होता, वह समदृष्टि रखते हुए सबके कल्याण में लगा रहता है।
अपरिग्रही थिरबुद्धि बिनीता। उर कारुन्य आत्मरस प्रीता।।
सेवहि मोहि जथारथ जानी। मम सरूप देखहि सब प्रानी।।
अपरिग्रही, स्थिरबुद्धि और विनीत मनुष्य, जिसके हृदय में करुणा है, जो आत्मरस में प्रीति रखता है-ऐसा भक्त मुझे (संसार के रूप में) यथार्थ जानकर मेरी सेवा करता है और समस्त प्राणियों में मेरा स्वरूप ही देखता है।
दो0- पूजा तात हमारि जो चहउ चित्त दै कीन्हि ।
अहमासक्ति बिहाइ जग सेवहु मोहि सम चीन्हि ।।43।।
हे तात! यदि तुम मेरा पूजन मन लगाकर करना चाहो, तो अहंकार और आसक्ति को छोड़कर संसार को मेरा ही स्वरूप जानकर उसकी सेवा करो।
चौ0- संजम भगति कर्म कृत नाना। फरहिं एक सतसंग सुजाना।।
अनरथ अरथ श्रेय संतापा। अनुचित उचित पुन्य अरु पापा।।
और हे ज्ञानी उद्धव! मनुष्य का संयम, भक्ति व किए गए अनेक कर्म एक सत्संगति के द्वारा ही फलित होते हैं अर्थात् उत्तम परिणाम देते हैं। अर्थ, अनर्थ, कल्याण, संताप, अनुचित, उचित, पुण्य और पाप-
सुजन संग बिनु जाहिं न जाने। तेहि अवसरु लखि भजहिं सयाने।।
संगति साधु सुगति संसारा। तरइ काठि परि सरि खरि धारा।।
सज्जनों की संगति के बिना समझे नहीं जा सकते। इसलिए अवसर मिलने पर समझदार मनुष्य उस (सत्संगति) का सेवन करते हैं। सज्जनों की संगति से ही संसार में उत्तम गति प्राप्त होती है, लकड़ी नदी की धारा में पड़कर तैरने लगती है-
पाथर परम मूढ़ता भारू। सद्य बूड़ नहिं होहि उधारू।।
तदपि सोउ गहि पद बर बारी। होहि चिकन घसि जात अगारी।।
किन्तु उसी जलधारा में पड़कर पत्थर (मूर्ख मनुष्य) अपने मूढ़तारूपी भार के कारण शीघ्र ही डूब जाता है, उसका उद्धार नहीं होता। फिर भी वह उस श्रेष्ठ जल (सज्जन पुरुष) के चरण पकड़कर आगे बढ़ते हुए घिसकर चिकना (संस्कारित) तो हो ही जाता है।
मैं बस सुजन संग सब भाँती। साधन अपर छोट तेहि पाँती।।
जप तप जोग जुगति अरु ध्याना। सतसंगति सुरसरि अस्नाना।।
मैं सब प्रकार से सत्संगति के वश में हूँ। मनुष्य के उद्धार के अन्य साधन उसकी तुलना में छोटे हैं। साधक के जप, तप, योग-युक्तियाँ और ध्यान-ये सब सत्संगतिरूपी गंगा में स्नान करने से ही-
पावन होहिं मुकुति फलु देहीं। समबुधि सृजहिं कुमति हरि लेहीं।।
गनिका गीध ब्याध ब्रज गोपी। पढ़े कि बेद मुकुत भए सोपी।।
पवित्र होते हैं और परिणाम में मुक्ति देते हैं। वे मनुष्य में समत्व-बुद्धि का सृजन करते हैं और उसकी कुबुद्धि का हरण कर लेते हैं। गणिका, गृद्धराज जटायु, व्याध और व्रज की गोपियाँ-इन्होंने कौन से वेदग्रंथ पढे़ थे-फिर भी ये मुक्त हुए अर्थात् कोरा ज्ञानी होने से सदाचरण युक्त होना अधिक फलदायी है।
प्रेम ग्यान बिनु ग्रंथ प्रबंधा। बादि रहित जिमि सुमन सुगंधा।।
सतसंगति मति पावनकारी। परम प्रभाउ प्रेम गति न्यारी।।
प्रेम के ज्ञान के बिना सारे वेदादि ग्रंथ व प्रबंध-काव्यादि वैसे ही व्यर्थ हैं, जैसे सुगन्ध से रहित पुष्प! सत्संगति बुद्धि को पवित्र करने वाली है। उसका प्रभाव आत्यंतिक और प्रेम की गति विलक्षण है।
ताते भजत मोहि सब माहीं। करि प्रिय साधु संग मति छाँहीं।।
बिरति निरति निषेध बिधि त्यागी। भजहु मोहि सतसंगति लागी।।
इसलिए मुझे सब में (प्रकटरूप) जानकर भजते हुए सज्जनों का प्रिय संग करके बुद्धि की छाया में वैराग्य, लिप्तता, निषेध और समर्थन छोड़कर सत्संगति में रहते हुए मेरा भजन करो।
दो0- सतजुग सुजन समाज एक रहेउ बरन नर हंस ।
एक बेद यक धरमु सब सुनहु जोग अवतंस ।।44।।
हे योगभूषण-उद्धव! सुनो-सतयुग में एक सज्जनों का ही सम्पूर्ण समाज था, लोगों का ‘हंस’ नामक एक ही वर्ण था। एक ही वेद और सबका धर्म भी एक ही था।
चौ0- पुनि निज कर्म भाव अनुसारा। भे जति बरन चारि संसारा।।
रति संतोष सत्व तप त्यागा। समता छमा सत्य अनुरागा।।
हे यति! फिर अपने कर्म और स्वभाव के अनुसार संसार में चार वर्ण हुए। सत्वगुण, संतोष, तप और त्याग में निरति तथा समत्व-भाव, क्षमा और सत्य में अनुराग-
जासु स्वभाव बसहिं गुन एते। सोइ जग बिप्र सकल नर सेते।।
रजस छत्र बिस तमस अयाने। सूद्र अबूझ जाहिं पहिचाने।।
जिसके स्वभाव में इतने गुण बसते हैं, वही संसार में ब्राह्मण कहलाता है और सारा मनुष्य समाज उसकी सेवा करता है। राजसिक गुण वाले क्षत्रिय और वैश्य, तथा तामसिक वृत्ति वाले अज्ञानी और नासमझ मनुष्य शूद्र के रूप में पहचाने जाते हैं।
बरन स्वभाव बृत्ति नर कहहीं। जनम लिहे जग बिप्र न रहहीं।।
ऊधव सत्य कहउँ तुम्ह पाहीं। कछु कछु सकल बरन सब माहीं।।
वर्ण मनुष्य के स्वभाव तथा तदनुसार उसकी वृत्ति का परिचायक है, संसार में ब्राह्मण के घर में जन्म लेकर कोई ब्राह्मण नहीं होता। उद्धव! मैं तुमसे सत्य कहता हूँ-सारे वर्णों के कुछ-कुछ गुण सब में होते हैं।
जासु प्रबृृृृत्ति अधिक जेहि होई। जानत जगत बरन तेहि सोई।।
भगति न लखइ रीति संसारा। भजहि मोहि सो मोहि पियारा।।
जिसकी प्रवृत्ति जिसमें अधिक होती है, संसार उसका वही वर्ण जानता है; किन्तु इस पर भी भक्ति इन सांसारिक रीतियों को नहीं मानती-जो मेरा भजन करता है, वही मुझे प्रिय होता है।
भगतँ मोर मोहि भजहिं सुभाए। करि सम सकल जीव जग जाए।।
ते हमार प्रिय हम तिन्ह केरे। जिन्ह उर प्रेमु भगत तेइ मेरे।।
संसार में उत्पन्न हुए सब जीवों को समान जानकर, मेरे भक्त मुझे उत्तम भाव से भजते हैं। इसलिए वे मेरे प्रिय होते हैं और मै उन्हें प्रिय हूँ। जिनके हृदय में प्रेम है, वे ही मेरे भक्त हैं।
जिन्ह उर गरबु जनम धन जाती। तिन्ह मैं तजा नीच सब भाँती।।
जेहि जग ब्रह्म लीन्ह पहिचानी। ऊधव सोइ सुपंडित ग्यानी।।
और जिनके हृदय में जन्म, धन और उच्च जाति का होने का गर्व है, उनको मैंने त्याग दिया, वे सब प्रकार से नीच हैं। हे उद्धव! जिसने इस संसाररूपी ब्रह्म को पहचान लिया, वही उत्तम ज्ञानी-पण्डित है।
अहंकार मन मूरख सोई। रेत भीति बिगरइ पल कोई।।
सहज अनंद सुक्ख दुख हानी। बिषय निरति कारनु दुख प्रानी।।
जिसके मन में अहंकार है, वही मूर्ख है-क्योंकि यह शरीर बालू की दीवार के समान किसी भी पल विनष्ट हो सकता है! स्वाभाविक आनन्द ही सुख है और उसकी हानि ही दुःख है। विषयों में लिप्तता ही प्राणियों के दुःख का कारण है।
सत्व सरग तम नरक बखाना। जियतहिं मनुज भोग बहु बाना।।
बिषयासक्त जीव असहाईं। अनासक्त ईस्वर सबु साईं।।
सात्विकता को स्वर्ग और तामसिकता को नरक कहा गया है और जीवित रहते हुए ही मनुष्य इन्हें अनेक रूपों में भोगता है। जो विषयों में आसक्त हैं, वे ही असहाय जीव हैं और जो अनासक्त है, वही सबका स्वामी ईश्वर है।
दो0- निंदा अस्तुति दोउ करि सुनि पावहिं नर दोष ।
होहिं भ्रष्ट सुभ पंथ मम मोह राग अरु रोष ।।45।।
निंदा और स्तुति दोनों ही करके या सुनकर मनुष्य दोषों से ग्रसित हो जाते हैं और ऐसे ही मनुष्य मेरे कल्याणकारी मार्ग से भ्रष्ट हो जाते हैं। राग और क्रोध दोनों ही मोह (के कारण होते) हैं।
चौ0- हरि तजि होहि जगत कोउ आना। तौ कोउ ऊँच नीच कोउ माना।।
माटी एक भांड बहु रूपा। काज भिन्न सब भाँति अनूपा।।
परमात्मा को छोड़कर संसार में कोई और हो, तो मनुष्य किसी को ऊँचा और किसी को नीचा माने! मिट्टी एक ही है, केवल उससे बनाए गए पात्रों के रूप एवं कार्य भिन्न-भिन्न हैं। वे सभी अनुपम हैं अर्थात् उनकी परस्पर तुलना संभव नहीं है।
फूटत होहिं तात रज सारे। तेहि घमंडु धरि नर दुख डारे।।
कहेउँ भागवत धर्म बखानी। जेहि आचरत लहहिं सुखु प्रानी।।
हे तात! फूटने पर वे सारे ही धूल हो जाते हैं। इसलिए इस मिट्टी के शरीर पर घमंड करके मनुष्य दुःख में पड़ते हैं। मैंने भागवत-धर्म का वर्णन कर दिया, जिसका आचरण करके प्राणी सुख प्राप्त करते हैं।
सब निज कर्म समर्पइँ मोहीं। जुत समदृष्टि भगत मम होहीं।।
एहि अनित्य तन जब लगि प्राना। तब लगि यह सरीर हरि जाना।।
मेरे भक्त समदृष्टि होते हैं, वे अपने सारे कृत-कर्म मुझे ही समर्पित कर देते हैं। इस अनित्य शरीर में जब तक प्राण हैं, तब तक ही यह परमात्मा तक पहुँचने का जलयान है।
एहि चढ़ि अनासक्त अबिकारा। पावहिं मोहि लाँघि भव धारा।।
कर्म अकाम सकल सुख रासी। तेहि बस मैं अचिंत अबिनासी।।
अनासक्त और विकाररहित भक्त इस यान पर चढ़कर संसाररूपी जलधारा को लाँघकर मुझे प्राप्त करते हैं। निष्काम-कर्म सारे सुखों की राशि हैं, मैं अचिंत्य और अविनाशी परमात्मा उसी के वश में हूँ।
ऊधव यह सुचि धरमु हमारा। लिंग जाति कुल भेद न मारा।।
जे एहि धरहिं सुपावन जानी। श्रद्धा सुमति प्रेम पहिचानी।।
उद्धव! मेरा यह पवित्र (भागवत) धर्म लिंग, जाति अथवा वंश के भेद से पीड़ित नहीं है। जो मनुष्य इसे श्रद्धा, सुबुद्धि व प्रेम से पहचानकर उत्तम और पवित्र जानकर धारण करते हैं-
होहिं ते मुकुत बचनु मम साँचा। तात परम पद साधनु राँचा।।
सुजन समाज सुनायहु देखी। हर कलेस मम धरमु बिसेषी।।
वे मुक्त हो जाते हैं-मेरा यह वचन सर्वथा सत्य है। हे तात! मैंने (इस भागवत-धर्म के रूप में) परमपद (मुक्ति) के प्राप्ति का साधन रच दिया है। मेरा यह धर्म क्लेश का हरण करने वाला है-इसे सज्जनों के समाज को देखकर अवश्य सुनाना।
अब तुम्ह मोर रजायसु मानी। मम बद्रिकाधाम सुभ जानी।।
जाहु जोगिबर होहु सुखारी। ब्याप न तुम्हहिं जगत दुखु भारी।।
अब तुम मेरी आज्ञा मानकर तथा इसे कल्याणकारी जानकर मेरे बद्रिकाश्रम चले जाओ। हे योगिश्रेष्ठ! जाओ-तुम सुखी हो। तुम्हें संसार का भारी दुःख न व्याप्त हो!
दो0- सुनि ऊधव भरि नयन जलु बिबस प्रेम जदुनाथ ।
रुद्ध कंठ कर जोरि कह तजत प्रान जनु साथ ।।46।।
यह सुनकर मानो उनके प्राण उनका साथ छोड़ रहे हों, उद्धवजी ने आँखों में आँसू भरकर यदुनाथ श्रीकृष्ण के प्रेम से विवश होकर हाथ जोड़कर रुँधे हुए कंठ से कहा-
चौ0- मोहि निज भगति ग्यान परितोषी। निज मत सकल जगत हित पोषी।।
अब जो कहहु जान गिरधारी। नाथ कि जियहि मीन बिनु बारी।।
हे गिरधर! मुझे अपने ज्ञान और भक्ति से परितुष्ट करके और सारे संसार के हित-साधन हेतु अपने भागवत-मत का उपदेश करके अब जो आप मुझे जाने के लिए कह रहे हैं, हे नाथ! क्या मछली जल के बिना जिंदा रह सकती है?
तदपि कृपानिधि आयसु करहूँ। सुमिरत प्रभु जग जियत बिचरहूँ।।
गुर दयाल मम भव भ्रम छाँटा। लखउँ जगत प्रभु रूप बिराटा।।
हे कृपानिधि! फिर भी मैं आपकी आज्ञा का पालन करूँगा और प्रभु के नाम का स्मरण करते हुए संसार में विचरूँगा। हे दयालु सद्गुरु! आपने मेरा संसार-सम्बंधी भ्रम नष्ट कर दिया, अब मेरी दृष्टि में यह संसार ही आपका विराट रूप है।
कह सुक अस प्रभु गिरा नियोगी। हरि पद रज सँवारि सिर जोगी।।
गयउ बद्रिकाश्रम अवनीसा। धरि हरिचरितसुधा घट सीसा।।
श्रीशुकदेवजी ने कहा-हे राजा परीक्षित! इस प्रकार प्रभु श्रीकृष्ण की आज्ञा में नियुक्त होकर योगि-शिरोमणि उद्धवजी भगवान के चरणों की धूलि माथे पर लगाकर, श्रीहरि के चरित्ररूपी अमृत-घट को सिर पर रखकर बद्रिकाश्रम चले गए।
